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सैलाब

मानव-प्रसंगों के गहरे कठिन फ़लसफ़े

अब न कोई सवाल

न जवाब

कहीं कुछ नहीं

"कुछ नहीं" की अजीब

यह मौन मनोदशा

अपार सर दर्द

ठोस, पत्थर के टुकड़े-सा

हृदय-सम्बन्ध सतही न होंगे, सत्य ही होंगे

वरना वीरान अन्तस्तल-गुहा में

दिन-प्रतिदिन पल-पल पल छिन

गहन-गम्भीर घावों से न रिसते रहते

दलदली ज़िन्दगी के अकुलाते

अर्थ अनर्थ

कुछ हुआ कि झपकते ही पलक

विश्व-दृश्य सारा अचानक बदल गया

ज़िन्दगी का घड़ा उस अमुक पल में

धड़ाम

हाथ से छूटा

आस्था का अस्थि-पंजर फूट गया

कोई नहीं है, किसे पुकारूँ...

किससे कहूँ ... क्या करूँ ... ?

नपुंसक हुए तथ्यों की, आत्मज सत्यों की

नव-विधवा-सी स्थिति

न कोई सवाल

न जवाब

भयावनी चीखें

और कुछ नहीं

     

 - विजय निकोर

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by vijay nikore on April 28, 2015 at 4:12pm

//एक अदृश्य दर्द ली हुई, पंक्तियाँ. भाव अंतर को भेद देते है//

आदरणीय जितेन्द्र जी, रचना की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार।

Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on April 28, 2015 at 7:37am

आस्था का अस्थि-पंजर फूट गया...आदरणीय vijay nikore जी बहुत प्रभावी रचना हुई है ......बधाई....सादर  


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on April 27, 2015 at 3:35pm
आदरणीय विजय निकोर सर इस सशक्त प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई निवेदित है। सादर।
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 27, 2015 at 12:27pm

नपुंसक हुए तथ्यों की, आत्मज सत्यों की

नव-विधवा-सी स्थिति

न कोई सवाल

न जवाब

भयावनी चीखें

और कुछ नहीं.......एक अदृश्य दर्द ली हुई, पंक्तियाँ. भाव अंतर को भेद देते है, बधाई सर

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