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ग़ज़ल :-एक चहरे में दूसरा क्या है

बह्र :- फ़ाईलातुन मुफ़ाइलुन फ़ैलुन

आईनागर ज़रा बता क्या है
एक चहरे में दूसरा क्या है

आग गुलज़ार कैसे बनती है
देखना है तो सोचता क्या है

किस लिये हम से पूछता है नदीम
तू नहीं जानता,हुवा क्या है

क्या छुपा कर रखा है सीने में
और होटों से बोलता क्या है

दिल को छू जाए तो ये जादू है
वरना आवाज़ में धरा क्या है

आईने की तरह चमकती है
हम बताऐं तुम्हें वफ़ा क्या है

दोनों बर्बाद हो गए देखो
दुश्मनी के लिये बचा क्या है

मैं हूँ दीवाना और तू हुश्यार
मुझ से तेरा मुक़ाबला क्या है

ख़ुद को "ग़ालिब" समझ रहा है "समर"
"या इलाही ये माजरा क्या है"

"समर कबीर"
(मौलिक/अप्रकाशित)

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Comment by Samar kabeer on April 20, 2015 at 6:30pm
जनाब निलेश "नूर" जी,आदाब,सत्य वचन,आपने विस्तार से बताया और अपना क़ीमती समय दिया इसके लिये धन्यवाद,आपकी राय में इन अशआर को एसे ही रहने दें या तब्दील करें ? बराहे करम जवाब से नवाज़ें |
Comment by दिनेश कुमार on April 20, 2015 at 4:50pm
व्याकरण पक्ष गुणी जनों के लिए।
Comment by दिनेश कुमार on April 20, 2015 at 4:49pm
बहुत खूबसूरत ग़ज़ल हुई है। हर शे'र के लिए मेरी तरफ से भी हार्दिक दाद व मुबारकबाद आदरणीय समर कबीर सर जी।
Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 20, 2015 at 3:44pm

जी आदरणीय समर कबीर साहब.
कहीं इस बारे में कहीं पढ़ लिया था सो यहाँ कह दिया. किसी लेख में ये लिखा हुआ है इस विषय पर -"

तकाबुले रदीफ़ दोष के भेद

तकाबुले रदीफ़ दोष के दो भेद होते हैं तकाबुले रदीफ़ दोष

भेद १ - लाज्तमा-ए-ज़ुज्ब-ए-रदीफैन = मतला के अतिरिक्त यदि रदीफ़ का तुकांत स्वर मिसरा-ए- उला के अंत आ जाये तो उसे लाज्तमा-ए-ज़ुज्ब-ए-रादीफैन कहते हैं तकाबुले रदीफ़ दोष

भेद २ - लाज्तमा-ए-तकाबुल-ए-रदीफैन = मतला और हुस्ने मतला के अतिरिक्त किसी शेर में यदि रदीफ़ का तुकान्त पूरा एक शब्द या पूरी रदीफ़ मिसरा-ए-उला के अंत आ जाये तो उसे लाज्तमा-ए-तकाबुल-ए-रदीफैन कहते हैं शेर के दोषपूर्ण मतला होने भ्रम की स्थिति से बचने के लिए इस दोष से बचने की हर संभव कोशिश करनी चाहिए|

अरूजियों और उस्ताद शाइरों द्वारा केवल स्वर का उला के अंत में टकराना कई स्थितियों में स्वीकार्य बताया गया है यदि शेर खराब न हो रहा हो और यह ऐब दूर हो सके तो इससे अवश्य बचना चाहिए परन्तु इस दोष को दूर करने के चक्कर में शेर खराब हो जा रहा है अर्थात, अर्थ का अनर्थ हो जा रहा है, सहजता समाप्त ओ जा रही है अथवा लय भंग हो रहे है अथवा शब्द विन्यास गडबड हो रहा है तो इसे रखा जा सकता है और बड़े से बड़े शाइर के कलाम में यह दोष देखने को मिलता है"

इसके अतिरिक्त यदि कोई मान्यता हो तो मुझे ज्ञात नहीं है.
सादर  

Comment by Samar kabeer on April 20, 2015 at 3:39pm
जनाब गिरिराज भंडारी जी ,आदाब,ग़ज़ल में आपकी शिर्कत और हौसला अफ़ज़ाई के लिये तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ|
Comment by Samar kabeer on April 20, 2015 at 3:36pm
जनाब निलेश "नूर" जी,आदाब,ग़ज़ल में आपकी शिर्कत और हौसला अफ़ज़ाई के लिये तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ|
ग़ज़ल पोस्ट करने से पहले ही इस पर ग़ौर कर चुका हूँ,इसे तक़ाबुले रदीफ़ नहीं कहते,मेरी ग़ज़ल की पूरी रदीफ़ "क्या है ",सिर्फ़ "है" नहीं ,मिसाल के तौर पर शैर यूँ होता :-
"आग गुलज़ार कैसे बनता है
देखना है तो सोचता क्या है"
तब इसे तक़ाबुले रदीफ़ का दोष कह सकते थे |

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 20, 2015 at 2:56pm

क्या छुपा कर रखा है सीने में
और होटों से बोलता क्या है

दिल को छू जाए तो ये जादू है
वरना आवाज़ नें धरा क्या है   --  क्या बात है , आदरणीय समर भाई , बहुत खूब ग़ज़ल कही , हर शे र के लिये दाद हाज़िर है , कुबूल कीजिये ॥

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 20, 2015 at 2:27pm

बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है ग़ालिब की ज़मीन पर 
दुश्मनी के लिए बचा क्या है...वाह वा...
.
दूसरे, पाँचवे और छठे शेर में तकाबुले-रदीफ़ को देख लें 
सादर 

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