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‘’घर का मामला'' (लघुकथा)

‘’आपने आज का अखबार पढ़ा अशफ़ाक मियां” कश्मीर में हालात और बेकाबू हो गये हैं!

“हाँ श्रीवास्तव जी पढ़ा!” इतना कहकर अशफ़ाक मियां चुप हो गये।

‘’आखिर मौकापरस्तों के चंगुल में जनता कैसे फँस जाती है ?" श्रीवास्तव जी फिर बोल पड़े।

कुछ देर चुप रहने के बाद अशफ़ाक मियां गहरी साँस लेते हुए बोले---

‘’घर का मामला जब अदालत में जाये तो यही अंजाम होता है’’!

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Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on April 20, 2015 at 8:48pm

आदरणीय जीतेन्द्र जी लघुकथा पर आपकी प्रसंशा अलग मायने रखती है,हार्दिक आभार!

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on April 20, 2015 at 8:47pm

उत्साहवर्धन के लिए शुक्रिया आदरणीया सविता मिश्रा जी!

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on April 20, 2015 at 8:46pm

आ० सुधीर द्विवेदी जी आभार!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 20, 2015 at 12:21pm

 ‘’घर का मामला जब अदालत में जाये तो यही अंजाम होता है’’! ....बहुत उम्दा ,आदरणीय कृष्णा जी.

Comment by savitamishra on April 20, 2015 at 9:19am

बढ़िया और सचची   बात 

Comment by Sudhir Dwivedi on April 19, 2015 at 10:33pm
बिलकुल सच है ये घर के झगड़ों में पराये मौज उड़ाते है
सुंदर लघुकथा !!

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