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ग़ज़ल - लफ्ज़ सजाना पड़ता है.... (मिथिलेश वामनकर)

22—22—22—22—22—2

 

पलकों से हर लफ्ज़ सजाना पड़ता है

आँसू पीकर गीत बनाना पड़ता है  

 

मंहगाई में  झूठा रौब जताने को

चिल्लर को तनख्वाह बताना पड़ता है

 

नीला-नीला पानी कैसे लाल हुआ

बच्चों से हर राज़ छुपाना पड़ता है

 

दुनिया से जब यार मुकाबिल होता हूँ,

हर तेवर, हर रंग दिखाना पड़ता है

 

पत्थर जैसा जान हमे वो पेश आये

जिन्दा है अहसास कराना पड़ता है

 

जैसा दिखता है, वैसा होता है कब

दोनों में बस फर्क लगाना पड़ता है

 

रूह गुलामी से देखो कितनी लिपटी

अपना खुद को शोर सुनाना पड़ता है

 

आला अफसर की फितरत टॉमी जैसी

हर दिन अपना कौर  खिलाना पड़ता है

 

उनके दुःख में झूठें आँसू लाने को

झूठा हर अहसास जगाना पड़ता है

 

दुनिया का सच जाहिर करने ग़ालिब को

खुद को ही बदनाम जताना पड़ता है

 

 

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(मौलिक व अप्रकाशित)  © मिथिलेश वामनकर 
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Comment

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Comment by Nazeel on April 9, 2015 at 11:28am

आदरणीय मिथिलेश   भाई जी  अच्छी रचना  लिए  हार्दिक बधाई 

Comment by Dr. Vijai Shanker on April 9, 2015 at 11:24am
प्रिय मिथिलेश जी , बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल बनी है , बहुत बहुत बधाई , सादर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 9, 2015 at 11:15am

आदरनीय मिथिलेश भाई , गज़ल अच्छी हो सकती थी , पर जल्दबाजी साफ झलक रही है , आदरणीय समर भाई जी ने वे बातें कह दीं है जो  मै कहना चाहता था । इसके सिवाय एक दो बातें और कहना चाहता हूँ --

पलकों से हर लफ्ज़ सजाना पड़ता है

आँसू से फिर गीत बनाना पड़ता है   --    आँसू पी के ,  कहें तो ?

घर में अपना झूठा रौब जताने को

चिल्लर को तनख्वाह बताना पड़ता है    ---  कम से कम मै तो बात समझ  नहीं पाया , हो सकता है मिसरों मे राब्ता हो ,

                                                           गीदड़ हूँ , पर शेर  बताना पड़ता पड़ता है ,  इस भाव की ज़रूरत  है शायद ।

बाकी अशआर में भी तार्किकता एक बार देख जाइयेगा ॥

Comment by Samar kabeer on April 9, 2015 at 10:52am
जनाब मिथिलेश वामनकर जी,आदाब, अच्छी और सुन्दर ग़ज़ल के लिये दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं |
पिछली दो ग़ज़लों के मुक़ाबले में ये ग़ज़ल कुछ हल्की नज़र आई,इस मिसरे में :-

(1)"बच्चों से हर बात छुपाना पड़ता है"

इस मिसरे में "बात" स्त्रिलिंग है,यह मिसरा इस तरह सही हो सकता है :-

"बच्चों से ये राज़ छुपाना पड़ता है"

(2)"अपनी खुद को चीख सुनाना पड़ता है"

इस मिसरे में भी "चीख़" स्त्रिलिंग है

(3)"आधी रोटी रोज़ खिलाना पड़ता है"

इसी तरह इस मिसरे में भी "रोटी" स्त्रिलिंग है

(4)"बाज़ारी जज़्बात जगाना पड़ता है"

इस मिसरे में "जज़्बात" बहुवचन है ,"जज़्बा" एक वचन, "जज़्बात" बहुवचन है
इन त्रुटियों की तरफ़ कृपया ध्यान दीजियेगा,कृपया अन्यथा न लें |
Comment by Shyam Narain Verma on April 9, 2015 at 10:48am
"क्या बात है ..... बहुत खूब ... बधाई आप को "
Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on April 9, 2015 at 9:53am

आला अफसर की फितरत टॉमी जैसी

आधी रोटी रोज़ खिलाना पड़ता है

क्या बात है! आ० मिथिलेश सर!

कृपया ध्यान दे...

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