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एक हिंदी ग़ज़ल/आ चली आ सितम

बह्र-212 212 212 212
बाअदब नजरे पेश
---------------------
चीज है क्या ज़रा देख लूँ बेरहम।
दर्द की है कसम आ चली आ सितम। (१)
****
नूर तो आँख का ले गये हो चुरा,
चाँदनी रात का दे रहे क्यों भरम। (२)
****
हो रही नग्न है नाचती ये ख़ुशी,
क्या नजर चाहती देखना ये हरम। (३)
****
देश को बेचतें आज भी लोग जो,
मोल दे दो उन्हें बेच देगें धरम। (४)
****
माँगते हम नहीं भीख तुमसे कभी,
राह चलते गिरें सम्हलें क्या शरम। (५)
****
लो सतालो हमें फिर रुलालो हमें,
वो लहू भी नहीं अब रहा,हो गरम। (६)
****
खेल ये मात शह का शिकारी सभी,
सत्य का सर झुका है उठा तो कलम। (७)

------------------------
मौलिक एवं अप्रकाशित
सुनील शाहाबादी।

Views: 1128

Comment

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Comment by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on April 8, 2015 at 10:11am
जनाब शिज्जू शकूर जी नवाजिश बस प्रयास ही कर सकता हूँ बेहतर लगी शुक्रिया।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 8, 2015 at 10:04am

आदरणीय सुनील प्रसाद जी प्रयास हेतु बधाई

Comment by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on April 8, 2015 at 9:09am
अशेष आभार भाई कृष्णा मिश्रा जान गोरखपुरी जी रचना आपको पसंद आई कृत्य हुआ।
Comment by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on April 8, 2015 at 9:04am
आदरणीय सौरभ पांडे जी प्रथम तो आपको नमन आप हमारे खातिर अनजान नहीं हैं आपको हमने बहुत पढ़ा है और ये कहने में संकोच नहीं की आपके रचनाओं से बहुत कुछ सिखा है/यहाँ सवाल खुद को साबित करना भी बिलकुल नहीं है जैसा आपने सुझाया वैसा और उससे इतर भी मैंने प्रयास किया अब अगर आपके और अपने words index की बात करें तो सिर्फ वजन को अनुभव कीजिये बहर वाक्य वही हैं परन्तु अंदाज बिलकुल अलग आपके index में हल्कापन है हमारे index में भारीपन है जो मै चाहता था भाव भारी हो जाये और मिसरा क्या पूरी ग़ज़ल ही मै गाते हुये लिखता हूँ और शब्दों को वैसे ही रखता हूँ जो सुर में समाये, "चीज है क्या ज़रा--देखलूं बेरहरम/दर्द की है कसम--आचली आ सितम"
मुझे कहन में कहीं अटकन या रूकावट नहीं महसूस हो रही फिर भी आप सबके सुझाव और प्रतिक्रियायें मेरे लिये अमुल्य संपदा हैं जिसका सदैव आदर स्वागत रहेगा ऐसा नहीं की मै आप सबकी सुझाव पर ध्यान या मनन नहीं करता लेकिन आत्म संतुष्टि अपने भावों की स्थापत्यतता पर हर रचनाकार का अपना अधिकार ही होना चाहिये ये मेरा मानना है हाँ स्पष्ट कोई गलती हो तो रचनाकार स्वतः सुधार की ओर अग्रसर होगा और सुधार की गुन्जाइस तो सदैव बनी रहती है आपका आशीर्वचन पाकर धन्य हुआ हूँ मै आभार से भी ज्यादा ऋणी हूँ आपका, आशीष बनायें रखें नाचीज हूँ अभी मै विश्वास दिलाता हूँ आप जैसे पारस मिल गयें हैं तो कुंदन भी हो जाउँगा ।
Comment by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on April 8, 2015 at 8:22am
आदरणीया कांता रॉय जी आदरणीय डॉ विजय शंकर जी हार्दिक आभार है आप सबको मेरा।
Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on April 8, 2015 at 7:53am

लो सतालो हमें फिर रुलालो हमें,
वो लहू भी नहीं अब रहा,हो गरम।

सुन्दर गजल पर ढेरों मुबराक्बाग आदरणीय सुनील जी!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 8, 2015 at 7:17am

आदरणीय सुनील प्रसादजी, ग़ज़ल पर आपकी अच्छी कोशिश हुई है. आप पहले से लिखते रहे होंगे जो आपके अभ्यास के साथ-साथ प्रतिक्रियाओं पर आपके प्रत्युत्त्तर में भी दिख रहा है. अन्यथा आदरणीय मिथिलेश भाई के कहे पर ध्यान दिये होते, मनन करते, न कि अपने कहे को रेशनलाइज़ (rationalize) कर दिये होते.

कहा जाता है कि ग़ज़ल के मिसरों में अन्यथा शब्दिक पेंच न हों या कमसेकम हों या मिसरों में शब्दों का जक्स्टापोजीशन (juxtaposition) सहज हो तो बेहतर रहता है. इस हिसाब से इस ग़ज़ल के कई मिसरे बहर को साधते हुए सीधे-सीधे लिखे जा सकते हैं. जैसे -
नूर तो आँख का ले गये हो चुरा - आँख का नूर तो ले गये हो चुरा,
हो रही नग्न है नाचती ये ख़ुशी - नाचती ये ख़ुशी हो रही नग्न है .. इत्यादि

एक पुरानी फ़िल्म का बड़ा ही प्रसिद्ध गीत है - रात के हमसफ़र थक के घर को चले/ झूमती आ रही है सबा प्यार की. इस गीत की धुन पर तो चाहे जो कहते जायें भला ही लगेगा न !
आदरणीय मिथिलेश भाई का यही कहना था जिस पर सभी ग़ज़ल अभ्यासियों को ध्यान देना चाहिए.

जहाँ तक कहन का सवाल है, अभी यथोचित अभ्यास की आवश्यकता है. इस क्रम में सतत रहें.

विश्वास है, मैं अपनी बात कह पाया.
सादर

Comment by Dr. Vijai Shanker on April 8, 2015 at 5:06am
सुन्दर प्रस्तुति, बधाई, आदरणीय , सादर।
Comment by ajay sharma on April 7, 2015 at 11:00pm

umda 

Comment by kanta roy on April 7, 2015 at 10:51pm
खेल ये मात शह का शिकारी सभी ,सत्य का सर झुका है उठा तो कलम ....... वाह !!! क्या अंदाज़ -ऐ - बयाँ है आ.सुनील प्रसाद जी ... बधाई स्वीकार करे इस सुंदर गजल के लिए । आभार

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