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कहूं मरहम इसे या खंजरों का वार ही समझूं

१२२२     १२२२     १२२२  १२२२

इशारों को शरारत ही कहूं या प्यार ही समझूं 

कहूं मरहम इसे या खंजरों का वार ही समझूं 

कशिश बातों में तेरी अब अजब सी मुझ को लगती है 

तेरी बातों को बातें ही या फिर इकरार ही समझूं 

वो डर के भेडियों से आज मेरे पास आये हैं 

कहूं हालात इसको या कि मैं ऐतवार ही समझूं 

तेरी नजरों ने कैसी आग सीने में लगाई है 

तुझे कातिल कहूं मैं या इसे उपकार ही समझूं 

पड़े ओंठों पे ताले पलकें उठती और गिरती हैं 

ये मेरी जीत है या इस को अपनी हार ही समझूं 

नहीं खिड़की पे आती आजकल क्या बात है बोलो 

यूं शर्माती हो तुम या मैं इसे इनकार ही समझूं 

है पिघली बर्फ दिल की आँख से आंसू लगे बहने 

सहेजूँ इनको मोती मान या बेकार ही समझूं 

मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by Dr Ashutosh Mishra on March 25, 2015 at 12:14pm

आदरणीय गोपाल सर ..आप बड़ों का आशीर्वाद मिलता है तो दिल को बहुत सुकून मिलता है सादर धन्यवाद के साथ 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on March 25, 2015 at 12:12pm

आदरणीया सविता जी ..आप सब की प्रतिक्रियाओं से ही रचना धर्मिता को नयी उर्जा मिलती है ,सादर धन्यवाद के साथ 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on March 25, 2015 at 12:11pm

आदरणीय श्याम जी ..रचना पर आपकी उत्साहित करती प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद सादर 

Comment by somesh kumar on March 25, 2015 at 11:39am

वो डर के भेडियों से आज मेरे पास आये हैं 

कहूं हालात इसको या कि मैं ऐतवार ही समझूं 

सुंदर हरेक शे'र गहन अर्थ और भावना लिए है |बधाई !

Comment by umesh katara on March 25, 2015 at 8:46am

नहीं खिड़की पे आती आजकल क्या बात है बोलो 

यूं शर्माती हो तुम या मैं इसे इनकार ही समझूं 
वाह

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 24, 2015 at 10:53pm

पड़े ओंठों पे ताले पलकें उठती और गिरती हैं 

ये मेरी जीत है या इस को अपनी हार ही समझूं        क्या बात है! क्या बात है!

खुबसूरत गजल पर ढेरों बधाई!!आ० आशुतोष जी!

Comment by Dr. Vijai Shanker on March 24, 2015 at 10:32pm
पड़े ओंठों पे ताले पलकें उठती और गिरती हैं
ये मेरी जीत है या इस को अपनी हार ही समझूं
बहुत सुन्दर ग़ज़ल , आदरणीय आशुतोष मिश्रा जी, बधाई, सादर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on March 24, 2015 at 8:35pm

आदरणीय आशुतोष जी उम्दा और बेहतरीन ग़ज़ल हुई है, बह्र को गुनगुनाने में आनंद आ गया. हार्दिक बधाई निवेदित है. एक शेर बेबह्र लग रहा है देख लीजियेगा-

वो डर के भेडियों से आज मेरे पास आये हैं 

कहूं हालात इसको या कि मैं ऐतवार ही समझूं

Comment by ANJU MISHRA on March 24, 2015 at 6:05pm

बहुत सुंदर आशुतोष जी .... बधाई 

तेरे मुस्कुराने की अदा खींच लेती है मुझे 

ये तेरी कशिश है या प्यार का पैगाम समझूं 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 24, 2015 at 5:24pm

आ०आशुतोश जी

कहाँ थे मित्र बहुत . मिस किया हमने . सुन्दर गजल कही आपने .

है पिघली बर्फ दिल की आँख से आंसू लगे बहने 

सहेजूँ इनको मोती मान या बेकार ही समझूं

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