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हयात हमने गुज़री हे इन्तेहाँ की तरह

लहू से जिसको के सींचा था बागबां की तरह

वही चमन नज़र आता हे अब खिज़ां की तरह 
हवा का झोंका भी आया तो रोक लूँगा उसे 
खड़ा हूँ तेरी हिफाज़त में पासबां की तरह 
कभी हयात में हमको सुकूं  मिला ही नहीं 
के रोज़ो शब् नज़र आते हैं कारवां की तरह 
खुदा की याद में खुद को मिटा लिया जबसे 
मेरा वजूद ज़मीं पर हे आसमां की तरह 
ये तज़र्बे  बड़ी मुश्किल से पाये हैं हमने
हयात हमने गुज़ारी हे इन्तेहाँ की तरह 
वो जिसको लोग बुरा आदमी बताते थे 
सुलूक़ मुझसे किया उसने मेहरबां की तरह 
तमाम उम्र गुज़ारी हे मैंने ख़्वाबों में 
मुझे लगे हे हकीकत भी अब गुमां की तरह 
ज़ुबान खोल दी मैंने तो तेरी खैर नहीं 
इसी सबब से खड़ा हूँ मैं बेज़ुबां की तरह 
वो जिसके वास्ते खुद को मिटा दिया हमने 
भुला दिया हे हमें उसने दास्ताँ की तरह 
अजीब हाल हे हसरत जहाँ के लोगों का 

यहाँ यहाँ की तरह हैं वहां वहां की तरह

-मौलिक और अप्रकाशित-

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Comment by SHARIF AHMED QADRI "HASRAT" on March 16, 2015 at 3:20pm

hosla afzaai ke liya tamam hajrat ka tahe dil se shukriya ada karta hoon

Comment by SHARIF AHMED QADRI "HASRAT" on March 16, 2015 at 3:18pm

bahut bahut dhanyawad shyam ji

Comment by SHARIF AHMED QADRI "HASRAT" on March 16, 2015 at 3:15pm

aadarniya Hari prakash ji hosla afzaai ke liye bahut bahut shukriya 

Comment by Hari Prakash Dubey on March 12, 2015 at 2:13pm
आदरणीय शरीफ अहमद कादरी जी बहुत शानदार ग़ज़ल है
हवा का झोंका भी आया तो रोक लूँगा उसे
खड़ा हूँ तेरी हिफाज़त में पासबां की तरह ....वाह
तमाम उम्र गुज़ारी हे मैंने ख़्वाबों में
मुझे लगे हे हकीकत भी अब गुमां की तरह ...शानदार
वो जिसके वास्ते खुद को मिटा दिया हमने
भुला दिया हे हमें उसने दास्ताँ की तरह.......हर शब्द कमाल है , बहुत बहुत बधाई आपको !
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 12, 2015 at 11:34am

बहुत सुन्दर ग़ज़ल ! हार्दिक बधाई !

Comment by khursheed khairadi on March 12, 2015 at 9:09am
खुदा की याद में खुद को मिटा लिया जबसे 
मेरा वजूद ज़मीन पर हे आसमां की तरह 
ये तज़र्बे  बड़ी मुश्किल से पाये हैं हमने
हयात हमने गुज़ारी हे इन्तेहाँ की तरह 
वो जिसको लोग बुरा आदमी बताते थे 
सुलूक़ मुझसे किया उसने मेहरबां की तरह 
तमाम उम्र गुज़ारी हे मैंने ख़्वाबों में 
मुझे लगे हे हकीकत भी अब गुमां की तरह 
आदरणीय 'हसरत' साहब ,उम्दा ग़ज़ल हुई है ,हर इक शेर में शेरियत परवान पर है |मक्ते में तखल्लुस का अच्छा इस्तेमाल हुआ है |मतले ने कामयाब आगाज़ किया है |आपकी ग़ज़ल के सभी अशआर लासानी है |यह एक मुक़म्मल ग़ज़ल है |तहेदिल से ढेरों दाद कबूल फरमावें |सादर अभिनन्दन |
Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on March 12, 2015 at 6:08am

वाह जनाब पढ़ कर दिल ख़ुश हो गया ....बधाई हर एक शेर के लिये  

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 11, 2015 at 10:37pm
खुदा की याद में खुद को मिटा लिया जबसे 

मेरा वजूद ज़मीन पर हे आसमां की तरह  वाह!! वाह!! वाह!!

ये तज़र्बे  बड़ी मुश्किल से पाये हैं हमने
हयात हमने गुज़ारी हे इन्तेहाँ की तरह     क्या बात है!!
तमाम उम्र गुज़ारी हे मैंने ख़्वाबों में 
मुझे लगे हे हकीकत भी अब गुमां की तरह    लाजवाब!!
वो जिसके वास्ते खुद को मिटा दिया हमने 
भुला दिया हे हमें उसने दास्ताँ की तरह   अहा! क्या दाद दे इस शेर की! लाजवाब!!
बड़े दिनों बाद गजल सी गजल मिली!! लाजवाब आ० 'हसरत' तहेदिल से बधाइयाँ!!
Comment by Shyam Mathpal on March 11, 2015 at 7:47pm
Aadarniya sharif ji,
Sundar rachna ke liye sukriya.... badhai.
वो जिसके वास्ते खुद को मिटा दिया हमने 
भुला दिया हे हमें उसने दास्ताँ की तरह  -  Ye panktiyaan dil ko choo gaee. Aabhar.
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 11, 2015 at 7:02pm
अजीब हाल हे हसरत जहाँ के लोगों का 

यहाँ यहाँ की तरह हैं वहां वहां की तरह--------iइस शेर पर  आपकी कलम चूमने को जी चाहता है i बहुत खूब गजल कही आपने i आपका इस मंच पर स्वागत है i  सादर 'हसरत' साहेब  i

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