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किताब /पुस्तक पर -दोहे

पुस्तक गुण की खान है,सीखें रखती गोय
जो उसका प्रेमी बना ,जग में जय जय होय॥

सखी भरी है ज्ञान से,उर में रखती भाव
पढ़-पढ़ के हासिल करो,रहे न ज्ञान अभाव॥

इस पूरे संसार की,जो रखती है थाह
दुनियाँ में कैसे मिली,किसको कहाँ पनाह॥

वर्ण-वर्ण मिल बन गई,सुंदर सुखद किताब
मनसा वाचा कर्मणा ,रख लो खूब हिसाब ॥

गुणी जनों ने बैठ कर,लिखे सुघर मंतव्य
रुचि जिसकी जिसमें रहे, खोजो वो गंतव्य॥

मौलिक व अप्रकाशित 

कल्पना मिश्रा बाजपेई 

Views: 6772

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Comment by Hari Prakash Dubey on March 12, 2015 at 2:10pm
आदरणीया कल्पना मिश्रा जी, इस सुंदर प्रस्तुति हार्दिक बधाई ! सादर
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 12, 2015 at 12:04pm

आ० कल्पना बहन बहुत सुन्दर दोहे हुए है हार्दिक बधाई .

Comment by khursheed khairadi on March 12, 2015 at 9:01am

आदरणीया कल्पना जी ,सुन्दर दोहावली है ,सादर अभिनन्दन |

Comment by kalpna mishra bajpai on March 11, 2015 at 11:03pm

आप सभी आदरणीय मित्रों की आभारी हूँ /सादर 

Comment by kalpna mishra bajpai on March 11, 2015 at 11:02pm

आ० डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव सर आप के  मार्ग दर्शन के लिए आभारी हूँ /सादर 

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 11, 2015 at 10:46pm

जो उसका प्रेमी बना ,जग में जय जय होय॥ आदरणीय कल्पना मिश्रा जी सत्य, सुन्दर रचना  पर हार्दिक बधाइयाँ!! कबीर जी के बारे में आपका क्या ख्याल है?? मसि कागज गयो नहि हाथ!

Comment by maharshi tripathi on March 11, 2015 at 5:37pm

बहुत सुन्दर दोहे ,,,,

सखी भरी है ज्ञान से,उर में रखती भाव

पढ़-पढ़ के हासिल करो,रहे न ज्ञान अभाव॥,,,,सही कहा आपने ,,हार्दिक बधाई आपको आ.कल्पना मिश्रा जी |

Comment by Shyam Narain Verma on March 11, 2015 at 3:01pm
आपकी इस सुंदर प्रस्तुति पर सादर बधाई
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 11, 2015 at 12:52pm

आ० कल्पना जी

पुस्तक गुण की खान है

 

पढ़-पढ़ कर  हासिल करो,

 

वह रखती है थाह ,

कोई कैसा हो यहाँ सबको मिले पनाह

 

सब का करे  हिसाब ॥

 

अभिरुचि के अनुरूप ही सबका है गंतव्य  

सादर i

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