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ग़ज़ल १२२२-१२२२\१२२२ १२२२ ..करें कोशिश सभी मिलकर हसीं दुनिया बना दें फिर

करें कोशिश सभी मिलकर हसीं दुनिया बना दें फिर 

चलो जन्नत से भी बढ़कर जहां अपना बना दें फिर

लगाकर रेत में पौधे पसीने से चलो सींचें 

ये सहरा सब्ज़ था पहले यहाँ बगिया बना दें फिर

मेरी मानो रियाज़त से बदल जाती है तकदीरें 

हथेली की लकीरों में कोई नक्शा बना दें फिर

जलाकर खेत मेरे गाँव के बोले सियासतदां  

इन्हें रोटी नहीं मिलती इसे मुद्दा बना दें फिर   

दिलों के दरमियां कोई रुकावट क्यों  रहे यारो

गिराकर इन फसीलों को नया रस्ता बना दें फिर

ज़माने ने दिया है फिर नया इक ज़ख्म इस दिल को

अजी हम भी ग़ज़लगो हैं नया मिसरा बना दें फिर

तेरा हो दर्द या मेरा रहे जामिद न दिल ही में

ग़ज़ल 'खुरशीद' जी गाकर इसे दरिया बना दें फिर

मौलिक व अप्रकाशित  

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Comment

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Comment by khursheed khairadi on March 12, 2015 at 11:15am

आदरणीय गिरिराज सर ,आपका स्नेह मेरी पूंजी है |सादर आभार 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 12, 2015 at 7:29am

आदरणेय खुर्शीद भाई , हमेशा की तरह एक खूबसूरत गज़ल से रू बरू करवाया आपने , सभी अश आर बहुत सुन्दर हुये  हैं , दिली मुबारकबादें कुबूल करें ।

मेरी मानो रियाज़त से बदल जाती है तकदीरें 

हथेली की लकीरों में कोई नक्शा बना दें फिर

जलाकर खेत मेरे गाँव के बोले सियासतदां  

इन्हें रोटी नहीं मिलती इसे मुद्दा बना दें फिर   

दिलों के दरमियां कोई रुकावट क्यों  रहे यारो

गिराकर इन फसीलों को नया रस्ता बना दें फिर  --- ये अशआर बहुत ख़ास लगे , हार्दिक बधाई ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on March 12, 2015 at 5:19am

वाह वाह वाह ... आदरणीय खुर्शीद सर क्या खूब ग़ज़ल हुई है .... 

जलाकर खेत मेरे गाँव के बोले सियासतदां  

इन्हें रोटी नहीं मिलती इसे मुद्दा बना दें फिर ............. करारा शेर 

दिलों के दरमियां कोई रुकावट क्यों  रहे यारो

गिराकर इन फसीलों को नया रस्ता बना दें फिर............ अनुभवी बल्लेबाज़... फसीलों का खूब प्रयोग किया है.. यहाँ मैं कहता तो फसीलों दिमाग में आता नहीं और समझौता करके कह देता .... गिराकर फासलों को हम नया रस्ता बना दें फिर ...

ये दोनों अशआर कमाल के हुए है -

लगाकर रेत में पौधे पसीने से चलो सींचें 

ये सहरा सब्ज़ था पहले यहाँ दरिया बना दें फिर

मेरी मानो रियाज़त से बदल जाती है तकदीरें 

हथेली की लकीरों में कोई नक्शा बना दें फिर

मतला से मक्ता तक बेहतरीन और उम्दा ग़ज़ल .... आज की ग़ज़ल... आपकी ग़ज़लों का पाठ ... मेरे लिए सदैव एक पाठ होता है. इस बेहतरीन ग़ज़ल से रु ब रु कराने के लिए हार्दिक आभार. 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 12, 2015 at 12:24am

बहुत सही ... दाद कुबूल करें आदरणीय खुर्शीद भाई

Comment by Dr. Vijai Shanker on March 11, 2015 at 11:04pm
करें कोशिश सभी मिलकर हसीं दुनिया बना दें फिर
चलो जन्नत से भी बढ़कर जहां अपना बना दें फिर
बहुत ही सुन्दर एवं प्रभावी प्रस्तुति, आदरणीय खुर्शीद खैरादी जी , बधाई, सादर।
Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 11, 2015 at 10:58pm

लगाकर रेत में पौधे पसीने से चलो सींचें

ये सहरा सब्ज़ था पहले यहाँ दरिया बना दें फिर             वाह! वाह !बहुतखूब सर!

मेरी मानो रियाज़त से बदल जाती है तकदीरें 

हथेली की लकीरों में कोई नक्शा बना दें फिर        ग़जब! जवाब नही इस शेर का!

ज़माने ने दिया है फिर नया इक ज़ख्म इस दिल को

अजी हम भी ग़ज़लगो हैं नया मिसरा बना दें फिर     वाह वाह ! आपकी हाजिर जवाबी भी कमाल है सर!

 इस खुबसूरत गजल पर ढेरों दाद व  बधाइयाँ आदरणीय!!

Comment by maharshi tripathi on March 11, 2015 at 5:46pm

लगाकर रेत में पौधे पसीने से चलो सींचें 

ये सहरा सब्ज़ था पहले यहाँ दरिया बना दें फिर,,,,,,,,वाह!!! आपकी सोच को सलाम आ.खुर्शीद जी |

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 11, 2015 at 4:10pm

बहुत खूब ख़ुर्शीद साहब। अच्छे अश’आर हुए हैं। दाद कुबूल करें

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 11, 2015 at 12:32pm

आ० खुर्शीद भाई

सारी की सारी गजल बेमिसाल  i कहूं किस तरह अपने दिल का मैं हाल i

कमाल है खुर्शीद भाई i  सादर i

Comment by Hari Prakash Dubey on March 11, 2015 at 10:10am

आदरणीय खुर्शीद  भाई , बहुत ही लाजवाब प्रस्तुति है , सभी अ'शआर  खूबसूरत हैं, बहुत बहुत बधाई आपको ! सादर    

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