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दिल से हम असआर पकाया करते हैं - लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’

2222    2112   2222
***************************
पत्थर  पर  भी  प्यार  जताया करते हैं
इक  नूतन  संसार   बसाया   करते  हैं
****
लज्जत  तुमको  यार तनिक तो देंगे ही
दिल  से  हम असआर पकाया करते हैं
****
तनहा  हमको आप  समझना लोगो मत
हम  गम  का  दरवार  लगाया  करते  हैं
****
कुबड़ी  अपनी पीठ हुई  मत पूछो क्यों
यादों  का   हम  भार   उठाया  करते हैं
****
अश्कों से मत पूछ जिगर तक आजा तू
आँसू   केवल   सार   बताया   करते  हैं
****
जीवन बीता  किंतु न  समझे यारो हम
कैसे  दिल  के  तार   बजाया  करते  हैं
****
मौलिक और अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’

Views: 729

Comment

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 7, 2015 at 8:59pm

 आ० धामी जी

सुन्दर साफ़ सुथरी गजल i  बहत बहुत मुबारक i

Comment by Shyam Narain Verma on March 7, 2015 at 5:11pm
बहुत खूबसूरत ग़ज़ल! आपको बहुत-बहुत बधाई!
Comment by भुवन निस्तेज on March 7, 2015 at 2:17pm
बेहतरीन!

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