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ग़ज़ल .........;;;गुमनाम पिथौरागढ़ी

२२ २२ २२ २२

जाने क्या क्या सोचा होगा
घर पे घर जब तन्हा होगा

खुद में खुद को ढूँढा होगा
थोडा मुझको पाया होगा

मेरे बिन रह के घर,गम
मुझको भी तो तरसा होगा

घर से जब भी निकली लड़की
माँ ने रोका टोका होगा

डांट बुजुर्गों की चुभती है
स्वाद दवा क्या मीठा होगा

खिड़की और न दरवाजा है
अंतिम कमरा ऐसा होगा

मौलिक व अप्रकाशित

गुमनाम पिथौरागढ़ी

Views: 506

Comment

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Comment by भुवन निस्तेज on March 7, 2015 at 2:23pm
वाह भाई जी वाह....
Comment by gumnaam pithoragarhi on March 6, 2015 at 11:58am
शुक्रिया दोस्तों आपका प्रोत्साहन उर्जा देता रहता है ,,,,,,,,,,,,
Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on March 5, 2015 at 10:04pm

अत्यंत समसामयिक एवम सारगर्भित प्रस्तुति पर अनगिनत बधाई

Comment by Hari Prakash Dubey on March 5, 2015 at 9:37pm

आ. गुमनाम जी , सुन्दर ग़ज़ल पर बधाई प्रेषित ! सादर 

खुद में खुद को ढूँढा होगा
थोडा मुझको पाया होगा
मेरे बिन रह के घर,गम
मुझको भी तो तरसा होगा

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 5, 2015 at 8:55pm

खिड़की और न दरवाजा है
अंतिम कमरा ऐसा होगा------------इस तसव्वुर के लिए  मुबारकवाद i  सादर i

Comment by Shyam Narain Verma on March 5, 2015 at 10:54am
इस लाजवाब, उम्दा ग़ज़ल के लिए बहुत बहुत बधाई 

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