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ग़ज़ल-झील सा शीतल चाँद से सुन्दर लिख्खा है |

झील सा शीतल चाँद से सुन्दर लिख्खा है
हमने जो देखा है मंज़र लिख्खा है

अबजद हव्वज़ का भी जिन को इल्म नहीं
दुनिया ने उन को भी सुख़नवर लिख्खा है

आज उसी पर फूल वफ़ा के खिलते हैं
तुमने जिस धरती को बंजर लिख्खा है

पढ़कर देखो मेरी इन तहरीरों को
तुमको ही उन्वान बनाकर लिख्खा है

कुछ लोगों ने दौर-ए-ख़िज़ाँ के बारे में
कमरे में फूलों को सजाकर लिख्खा है

हमने बग़ावत करके सारी दुनिया से
महरूमी का नाम सिकन्दर लिख्खा है

"समर कबीर"
मौलिक/अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Samar kabeer on March 21, 2015 at 10:54am
जनाब धर्मेन्द्र जी, जनाब वीनस केसरी जी,मोहतरमा निधि अग्रवाल जी,मोहतरमा प्रतिभा त्रिपाठी जी,आदाब,हौसला अफ़ज़ाई के लिये आप सभी का तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ |
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 19, 2015 at 10:36am
बहुत खूब समर साहब, अच्छी ग़ज़ल हुई है। दाद कुबूल कीजिए

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 18, 2015 at 4:40am

मो. समर कबीर साहब,

इस मंच की परिपाटी के अनुसार ग़ज़लों को पोस्ट करते समय ग़ज़लकार अपनी ग़ज़ल के मिसरे का वज़न लिख दिया करते हैं. आपने भी इस पर अवश्य ध्यान दिया होगा. चूँकि यह मंच ’सीखने-सिखाने’ की अवधारणा पर कार्य करता है, मिसरों के वज़न दे दिये जाने से नव हस्ताक्षरों को ग़ज़ल को समझने में सहुलियत होती है.

सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 18, 2015 at 4:35am

आदरणीया निधि जी,

आदरणीया समर साहब की यह ग़ज़ल फेलुन फेलुन .. फ़ा  के अनुसार ग्यारह ग़ाफ़ (गुरु) पर सधे मिसरे की ग़ज़ल है.

यानी, २२ २२ २२ २२ २२ २

इस तरीके की ग़ज़लों में दो लाम (लघुओं) को एक गुरु की तरह व्यवहृत किया जा सकता है. आप इस मंच पर उपलब्ध ग़ज़ल के पाठों को कृपया ध्यान से पढ़ जाइये.

शुभेच्छाएँ

Comment by Nidhi Agrawal on March 17, 2015 at 3:43pm

आज उसी पर फूल वफ़ा के खिलते हैं
तुमने जिस धरती को बंजर लिख्खा है

पढ़कर देखो मेरी इन तहरीरों को
तुमको ही उन्वान बनाकर लिख्खा है

बहुत खूबसूरत भाव बने हैं सर.. मेरी जानकारी के लिए क्या आप इसकी बहर बताएँगे?

Comment by वीनस केसरी on March 17, 2015 at 2:14am

वाह वा जनाबे आली

ज़िन्दाबाद ज़िन्दाबाद

Comment by Samar kabeer on March 16, 2015 at 1:57pm
जनाब डा.विजय शंकर जी,जनाब सौरभ पाँडे जी,मोहतरमा राजेश कुमारी जी,महर्षि जी,ई.गणेश जी बाग़ी जी,आदाब अर्ज़ करता हूँ,और आप सभी का तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ,मेरे बेटे की परिक्षा ख़त्म होने में मात्र चार दिन शेष हैं इसके बाद मंच पर पुन: उपस्थित होता हूँ,एक बार फिर मंच को दिल से धन्यवाद करता हूँ|
Comment by Dr. Vijai Shanker on March 15, 2015 at 8:15pm
बस कुछ नहीं , आपकी इस रचना के माह की सवश्रेष्ठ रचना चुने और घोषित किये जाने पर खुशी दिल से हुयी , बहुत हुयी , दिल बहुत खुश हुआ , आपको बहुत बहुत मुबारकबाद , आदाब , सादर।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 15, 2015 at 7:40pm

पढ़कर देखो मेरी इन तहरीरों को
तुमको ही उन्वान बनाकर लिख्खा है

कुछ लोगों ने दौर-ए-ख़िज़ाँ के बारे में
कमरे में फूलों को सजाकर लिख्खा है

ग़ज़ब !
लेकिन मतले और मक्ते का ज़वाब नहीं.  दिल से बधाई कुबूल करें आदरणीय.
आपकी प्रस्तुत ग़ज़ल को विगत माह की सर्वश्रेष्ठ रचना चयनित होने पर विशेष बधाई और हार्दिक शुभकामनाएँ
 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 8, 2015 at 9:55am

बहुत ही लाजबाब ग़ज़ल हुई है आ० समर कबीर जी,देरी से पढने का खेद है  

आज उसी पर फूल वफ़ा के खिलते हैं
तुमने जिस धरती को बंजर लिख्खा है------एक ऐसा शेर जिसको बरसों बरस तक भूल नहीं पायेंगे ...कमाल कमाल 

बहुत बहुत बधाई आपको ढेरों दाद कबूलें 

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