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ग़ज़ल -- सुब्ह से शाम हम कमाते हैं

सुब्ह से शाम हम कमाते हैं
तब भी मुश्किल से घर चलाते हैं

ये विरासत में हमको सीख मिली
हम तो मेहनत की रोटी खाते हैं

शाम होते ही हम परिन्दों से
लौट कर अपने घर को आते हैं

जिनके सर पर खुदा का हाथ है वो
आँधियों में दिये जलाते हैं

रोज़-ए-महशर की छोड़ कर चिन्ता
रिन्द मयखाने रोज़ जाते हैं

मुझको दुनिया सराय लगती है
लोग आते हैं लोग जाते हैं

हम तो फुरसत में दिल के छालों को
शे'र के पर्दों में छुपाते हैं

दर्द -ए-ग़म क्यूँ किसी पे हो ज़ाहिर
हम यही सोच मुस्कुराते हैं

चाँद तारे 'दिनेश' सब हमको
उस खुदा की ज़िया दिखाते हैं

-- दिनेश कुमार २०/०२/२०१५

( मौलिक व अप्रकाशित )

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Comment by सर्वेश कुमार मिश्र on February 21, 2015 at 12:51am

वाह...वाह...वाह...वाह...बहुत बढ़िया ग़ज़ल!

Comment by सूबे सिंह सुजान on February 20, 2015 at 11:18pm

दिनेश जी, आपको बहुत बहुत बधाई, बहुत ही सुन्दर गज़लें प्रस्तित की हैं सभी रचनायें मन को भाई हैं।

और आप तो मेरे पडोसी हैं कभी मिलो जनाब , कुरूक्षेत्र में अदबी संगम का सक्रिय सदस्य हूँ, बेजार जी को आप जानते ही होंगे, मैं भी आपके शहर के सम्मेलनों में कंई बार आया हूँ मेरा नंबर 9416334841 है अपना उपलब्ध करायें

Comment by ajay sharma on February 20, 2015 at 10:48pm

bahut hi khoob , kamal gazal kahi hai ...........

Comment by Samar kabeer on February 20, 2015 at 10:16pm
जनाब दिनेश कुमार जी,आदाब,आप मेरी निगाह में ऐसे शाईर हैं जो बहुत ही सोच समझ कर ग़ज़ल कहते हैं ,और जो शाईर ऐसा करता है उसके यहाँ ग़लती की गुंजाइश कम होती है,एक फ़नकार का यह अख़लाक़ी फ़र्ज़ होता है कि वह अच्छी ग़ज़ल पर भरपूर दाद दे, और अगर किसी ग़ज़ल में कोई फ़ननी नुक़्स देखे तो फ़ौरन उसकी निशानदही करे,जो फ़नकार ऐसा नहीं करता वह मेरी नज़र में फ़नकार ही नहीं |

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 20, 2015 at 8:16pm

आदरणीय दिनेश भाई जी, बेहतरीन और उम्दा ग़ज़ल हुई है,ये अशआर तो कमाल हुए है- 

सुब्ह से शाम हम कमाते हैं
तब भी मुश्किल से घर चलाते हैं

शाम होते ही हम परिन्दों से
लौट कर अपने घर को आते हैं

मुझको दुनिया सराय लगती है
लोग आते हैं लोग जाते हैं

Comment by somesh kumar on February 20, 2015 at 7:53pm

सुंदर गज़ल भाई जी |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 20, 2015 at 7:12pm

शाम होते ही हम परिन्दों से
लौट कर अपने घर को आते हैं

मुझको दुनिया सराय लगती है
लोग आते हैं लोग जाते हैं  

दर्द -ए-ग़म क्यूँ किसी पे हो ज़ाहिर
हम यही सोच मुस्कुराते हैं --- आदरणीय दिनेश भाई , बहुत सुन्दर बातें कही है , ग़ज़ल के लिये और इन अशार के लिये दिली मुबारकबाद  ॥

Comment by दिनेश कुमार on February 20, 2015 at 6:51pm
आदरणीय VIRENDER VEER MEHTA सर जी, हौसला अफजाई का बहुत शुक्रिया।
Comment by दिनेश कुमार on February 20, 2015 at 6:50pm
आदरणीय maharshi tripathi सर जी, बहुत शुक्रिया आदरणीय।
Comment by दिनेश कुमार on February 20, 2015 at 6:49pm
आदरणीय Samar kabeer सर जी, हौसला अफजाई के लिए बहुत आभारी हूँ। ज़ियादा खुशी होती अगर आप जैसे अनुभवी / उस्ताद लोग गलतियां भी बता देते। ताकि मैं सुधार कर सकता।

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