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एक मुट्ठी गालियाँ...... (मिथिलेश वामनकर)

2122—2122—2122—212

 

रात  भर  संघर्ष  कर  जब  थक  गई ये  आँधियाँ

एक दस्तक दी हवा ने, खुल  गई सब  खिड़कियाँ

 

जो गया ,  जाना उसे  था , कौन  जो  ठहरा  बता

बैठ कर  लिखते   रहोगे  मर्सिया  कब तक मियाँ

 

तीर  बूँदों  के  भला ,  क्या  आपको  आये  मज़ा

भीग  जाने   का  हुनर  तो  जानती  है  छतरियाँ

 

तीरगी  से  क्यूँ   लबालब   है  मरासिम  याखुदा

रौशनी  भी  कैसे   आये   आज  उनके  दरमियाँ

 

ज़ेब  में  है वज्न  कितना ,  ये  जमाना   देखता

फूल कितना खिल गया है, देखती  है  तितलियाँ

 

सौंपकर  अपना खज़ाना  ज़िन्दगी ये क्या किया

इक चिमुट भर दी दुआ फिर एक मुट्ठी गालियाँ

 

ऐ  समन्दर  बोल  तो , ये  है  भला  कैसी  सज़ा

किस तरह  मुमकिन बता बैठे किनारे मछलियाँ

 

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(मौलिक व अप्रकाशित)  © मिथिलेश वामनकर 
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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 4, 2015 at 9:33pm

आदरणीय डॉ विजय शंकर सर, बहुत बहुत आभार, हार्दिक धन्यवाद 

Comment by विनय कुमार on February 4, 2015 at 7:07pm

बेहद लाजवाब , बहुत उम्दा ग़ज़ल | बहुत बहुत बधाई आपको ..

Comment by दिनेश कुमार on February 4, 2015 at 6:52pm
उच्च कोटि की ग़ज़ल ..हर एक शे'र लाजवाब ...वाह वाह भाई मिथिलेश जी ...वाह
Comment by मोहन बेगोवाल on February 4, 2015 at 6:36pm

 सर जी,लाजवाब गज़ल कहने के लिए, बधाई कबूल करें , हर शे'र अपने आप में कमाल का

Comment by VIRENDER VEER MEHTA on February 4, 2015 at 5:51pm

.........ज़ेब  में  है वज्न  कितना ,  ये  जमाना   देखता

        फूल कितना खिल गया है, देखती  है  तितलियाँ.......

Sahaz shabado me jamaane ka vartmaan nazariya... Sundar Ati sundar. Mitilesh Vaamankar bhai

Comment by gumnaam pithoragarhi on February 4, 2015 at 5:48pm

वाह बहुत सुन्दर ग़ज़ल हुई है भाई जी वाह बधाई

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on February 4, 2015 at 4:59pm

बहुत सुंदर सहज गजल, आदरणीय मिथिलेश जी. प्रभावी व् आकर्षित करते शेर एक  अतुकांत सा आनंद भी दे रहे हैं


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 4, 2015 at 3:29pm

रात  भर  संघर्ष  कर  जब  थक  गई ये  आँधियाँ

एक दस्तक दी हवा ने, खुल  गई सब  खिड़कियाँ

ऐ  समन्दर  बोल  तो , ये  है  भला  कैसी  सज़ा

किस तरह  मुमकिन बता बैठे किनारे मछलियाँ  -- खूब सूरत गज़ल कही है , ये शे र बहुत खूब कहे हैं ! दिली मुबारकबाद अपको ।

Comment by Shyam Narain Verma on February 4, 2015 at 11:41am
बहुत खूब ॥ आपको हार्दिक बधाइयाँ ॥

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 4, 2015 at 10:54am

//रात भर संघर्ष कर जब थक गई ये आँधियाँ
एक दस्तक दी हवा ने, खुल गई सब खिड़कियाँ//......वाह वाह, क्या बेहतरीन मतला हुआ है, साहब जबरदस्ती आप कुछ न कर पायेंगे, प्यार से सब कुछ समर्पित है, गज़ब गज़ब गज़ब.

//जो गया , जाना उसे था , कौन जो ठहरा बता
बैठ कर लिखते रहोगे कब तलक यूं मर्सियाँ// बहुत ही सुन्दर शे'र, जो होना था वो हो गया, चल आगे बढ़, और भी रास्ते हैं.

//तीर बूँदों के भला , क्या आपको आये मज़ा
भीग जाने का हुनर तो जानती है छतरियाँ// आय हाय हाय, क्या बेजोड़ कहन है, आनंद आ गया, दुःख को भी इस तरह से सहन करना कि उसका प्रभाव केवल बाहर ही हो. बेजोड़.

//तीरगी से क्यूँ लबालब है मरासिम याखुदा
रौशनी भी कैसे आये आज उनके दरमियाँ// सुन्दर शेर.

//ज़ेब में है वज्न कितना , ये जमाना देखता
फूल कितना खिल गया है, देखती है तितलियाँ// बाज़ार का ज़माना है और बाज़ार तो टिका ही है जेब पर, बढ़िया शेर.

//सौंपकर अपना खज़ाना ज़िन्दगी ये क्या किया
इक चिमुट भर दी दुआ फिर एक मुट्ठी गालियाँ// चिमुट का प्रयोग आकर्षित कर रहा है.

//ऐ समन्दर बोल तो , ये है भला कैसी सज़ा
किस तरह मुमकिन बता बैठे किनारे मछलियाँ// बहुत खूब, शरीर से प्राण छीन कहते हो जुग जुग जीयो...कमाल है.

बहुत ही प्यारी ग़ज़ल हुई है, आनंद आ गया, बहुत बहुत बधाई आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी, ऐसी गज़लें रोज नहीं हुआ करतीं.

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