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मौत ने काटी फसल और जिंदगी बोती रही

रात में फुटपाथ पर इक बेबसी रोती रही,
लोग तो जागे मगर संवेदना सोती रही,

शाम होते ही जमीं पर तीरगी छाने लगी,
आसमानों में सुबह तक रोशनी होती रही,

याद की चादर वो अपने आंसुओं की धार से,
दर्द की कालिख मिटाने के लिए धोती रही,

किसलिए इतनी मशक्कत, जब उसे पीना नहीं
शहद मधुमक्खी न जाने किसलिए ढोती रही

ऐ खुदा तेरी खुदाई का सबब ये भी मिला,
मौत ने काटी फसल और जिंदगी बोती रही।।

.

(अतुल)
मौलिक व अप्रकाशित

Views: 1098

Comment

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Comment by atul kushwah on January 27, 2015 at 5:19pm

आदरणीय शिज्जू शकूर भाई साहब, आभार आपका, कृपया स्नेह बनाए रखिए। सादर

Comment by atul kushwah on January 27, 2015 at 5:17pm

आदरणीया महिमा जी..बहुत आभारी हूं आपका। सादर—अतुल

Comment by khursheed khairadi on January 27, 2015 at 11:03am

याद की चादर वो अपने आंसुओं की धार से,
दर्द की कालिख मिटाने के लिए धोती रही,

किसलिए इतनी मशक्कत, जब उसे पीना नहीं
शहद मधुमक्खी न जाने किसलिए ढोती रही

आदरणीय अतुल जी उम्दा ग़ज़ल हुई है |सभी अशहार लाज़वाब है |सादर अभिनन्दन 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 27, 2015 at 10:40am

आदरणीय अतुल भाई ,बढिया ग़ज़ल कही l हार्दिक बधाइ l


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 26, 2015 at 6:23pm

शाम होते ही जमीं पर तीरगी छाने लगी,
आसमानों में सुबह तक रोशनी होती रही,

याद की चादर वो अपने आंसुओं की धार से,
दर्द की कालिख मिटाने के लिए धोती रही,

किसलिए इतनी मशक्कत, जब उसे पीना नहीं
शहद मधुमक्खी न जाने किसलिए ढोती रही               -------------  बढिया ग़ज़ल कही आदरणीय अतुल भाई , हार्दिक बधाइयाँ ।

Comment by Rahul Dangi Panchal on January 26, 2015 at 5:01pm
सुन्दर गजल
Comment by sunita dohare on January 26, 2015 at 2:38pm

किसलिए इतनी मशक्कत, जब उसे पीना नहीं

शहद मधुमक्खी न जाने किसलिए ढोती रही.....बहुत खूब लिखा आपने .....हार्दिक बधाई आपको !

Comment by Hari Prakash Dubey on January 26, 2015 at 11:53am

आदरणीय मिथिलेश जी ने मन की बात कह दी , पर कोई बात नहीं , वैसे आप इस मंच से भी अपनी रचनायें शेयर कर सकतें हैं ! सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 26, 2015 at 11:43am

किसलिए इतनी मशक्कत, जब उसे पीना नहीं
शहद मधुमक्खी न जाने किसलिए ढोती रही

ये शेर अब तक अप्रकाशित है इसके लिए हार्दिक बधाई. साथ ही मिसरा-ए-सानी बेबह्र हुआ है देख लीजियेगा.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 26, 2015 at 11:38am

आदरणीय अतुल कुमार कुशवाहा 'मौसम' जी इस सुन्दर ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई. एक निवेदन है कृपया पूर्व प्रकाशित रचनाएँ पुनः पोस्ट न करे. ये ग़ज़ल कई वेबसाइट/ब्लॉग/ सोशल साईट पर आप प्रकाशित कर चुके है. सुलभ सन्दर्भ हेतु एक दो लिंक 

https://www.facebook.com/permalink.php?id=1568730170022210&stor...

http://atulkushwah.jimdo.com/2014/12/25/new-blog-post/

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