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प्रिय ! इस जीवन का तुम बसंत हो ....

प्रिय ! इस जीवन का तुम बसंत हो ....

तुम ही आदि हो तुम ही अनन्त हो
प्रिय ! इस जीवन का तुम बसंत हो

नयन आँगन का तुम मधुमास हो
रक्ताभ अधरों की तुम ही प्यास हो
तुम ही सुधि हो मेरे मधु क्षणों की
मेरे एकांत का तुम ही अवसाद हो
नयन पनघट का  मिलन  पंथ हो

तुम ही आदि हो तुम ही अनन्त हो
प्रिय ! इस जीवन का तुम बसंत हो


इस  जीवन  की  तुम  हो परिभाषा
मिलन- ऋतु  की  तुम  अभिलाषा
भ्रमर  आसक्ति  का  मधु  पुष्प हो
बिना  दरस  दृग  तुम बिन प्यासा
इस  प्रेम  विरह  का तुम्ही अंत हो

तुम ही आदि हो तुम ही अनन्त हो
प्रिय ! इस जीवन का तुम बसंत हो

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Sushil Sarna on January 24, 2015 at 7:26pm

आदरणीय  Rahul Dangi   जी रचना पर आपकी स्नेहिल प्रशंसा का हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on January 24, 2015 at 7:25pm

आदरणीय डॉ गोपाल नरायन श्रीवास्तव जी रचना पर आपके आशीर्वचनों ने रचना को एक नयी ऊंचाई प्रदान की है  … आपका तहे दिल से शुक्रिया। 

Comment by Rahul Dangi Panchal on January 24, 2015 at 6:58pm
बहुत सुन्दर रचना हुई वाह! वाह आदरणीय
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 24, 2015 at 1:03pm

सरना जी

बसंत पंचमी के दिन आपकी इस अद्भुत रचना से मन प्रसन्न हो गया  i सादर i

Comment by Sushil Sarna on January 24, 2015 at 12:33pm

आदरणीय    शिज्जु "शकूर" जी  गीत पर आपकी आत्मीय ऊर्जावान प्रशंसात्मक प्रतिक्रिया का तहे दिल से शुक्रिया। 

Comment by Sushil Sarna on January 24, 2015 at 12:33pm

आदरणीय   मिथिलेश वामनकर  जी मेरे द्वारा सृजित गीत पर आपकी आत्मीय ऊर्जावान प्रशंसात्मक प्रतिक्रिया का तहे दिल से शुक्रिया। 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on January 23, 2015 at 9:36pm

आदरणीय सुशील सरना सर बहुत सुंदर गीत हुआ है बहुत बहुत बधाई इस रचना के लिये


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 23, 2015 at 8:19pm

वाह वाह .. आदरणीय सुशील सरना सर बहुत सुन्दर गीत हुआ है .... सभी पद बहुत प्यारे है प्रेम रस से भीगी इस सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई 

Comment by Sushil Sarna on January 23, 2015 at 7:27pm

आदरणीया pratibha tripathi   जी रचना पर आपकी स्नेहिल प्रशंसा का हार्दिक आभार। 

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