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ग़ज़ल - दिल में सुलगा हुआ शरर देखा ( गिरिराज भंडारी )

२१२२    १२१२    २२ /११२

फिर  से उगता हुआ  जो पर देखा

तो बहुत  झूम  झूम   कर  देखा

 

धूप  में  झुलसा  हर  बशर  देखा   

तन  पसीने  से  तर ब तर  देखा

 

जल  सके  आग,  कोशिशें   देखीं

दिल  में  सुलगा  हुआ शरर  देखा

 

कारवाँ   साथ  था  चला   लेकिन

खुद को ही खुद का हम सफ़र देखा

 

सर परस्ती   रही   सियासत  की

ज़ुर्म  कर जो   झुका न सर  देखा

 

हद  के  बाहर  दुआ  में हाथ  उठे  

हर  , अमल  में  बहुत कसर देखा

 

ताज  में ताब  थी या  सर में  थी  

जाना, जब  सर को बे असर  देखा

 

आदतें     छोड़ती    नहीं   यारों

पीछे  आतीं  हैं, भाग  कर   देखा

*******************************

मौलिक एअव अप्रकाशित

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Comment by Hari Prakash Dubey on January 12, 2015 at 5:16pm

कारवाँ   साथ  था  चला   लेकिन

खुद को ही खुद का हम सफ़र देखा,   सुन्दर रचना ,हार्दिक बधाई आदरणीय गिरिराज भंडारी सर ! सादर

Comment by Shyam Narain Verma on January 12, 2015 at 5:15pm

".वाह क्या बात है ,,,,,,,,,,,,,खूबसूरत गजल के लिए आपको हार्दिक बधाईसादर "

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 12, 2015 at 4:00pm

आदतें     छोड़ती    नहीं   यारों

पीछे  आतीं  हैं, भाग  कर   देखा-------------शुभान अल्लाह I

Comment by Madan Mohan saxena on January 12, 2015 at 3:12pm

बेहतरीन


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 12, 2015 at 11:54am
मतला कमाल हुआ है।
आदतें छोड़ती नहीं यारों
पीछे आती है भागकर देखा। । क्या खूब कहा है! बेहतरीन अशआर

इस बेहतरीन ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई सर

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