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सुन्दर शय्या
अधमुँदी सी आँखे
एक लम्बी सांस
एकांत वास
सोच के तार
अतीत मे जा 
जिंदगी की किताब
खोली जो इक बार
पन्ना- दर- पन्ना
धोखा, छल, आघात
कभी भावुकता तो 
कभी अज्ञानता
भरे निर्णय,
कभी विवशता
रिश्ते निभाने की
तो कभी मजबूरी 
सामाजिकता की,
जीवन की लम्बी डगर
पग-पग अवरोध,
बावजूद, बढ़ती गई वो 
कदम-कदम
लड़खड़ाती,संभलती
तपन दिनकर की सहती,
चढती गई
हर चढाई
मिले जो वादे 
जीवन मे
सब हारी
छला सबने
बारी - बारी
अब शाम जीवन की
ढलने को आई
थकन से चूर
जख्मों से आहत
जीने को मजबूर |

अचानक,
एक आह !!
बंद जीवन की किताब
खुली आँखें
माथे पर लकीरें
स्याह अन्धेरा  
भारी पलकें
घनी काली रात
शून्य को प्रस्थान 
विश्राम,विश्राम,विश्राम ||
**


मीना पाठक 
मौलिक/अप्रकाशित 

Views: 751

Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 12, 2014 at 11:51am

आदरणीया मीना बहन जीवनका सुंदर शब्दचित्र प्रस्तुत किया है । हार्दिक बधाई स्वीकारें ।


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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 11, 2014 at 9:37pm

वाह आदरणीय मीना जी बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति बहुत बहुत बधाई आपको

Comment by Meena Pathak on December 11, 2014 at 6:05pm

आदरणीय मिथिलेश जी रचना सराहने हेतु बहुत बहुत आभार 

Comment by Meena Pathak on December 11, 2014 at 6:04pm

आदरणीय राम आसरे जी हार्दिक आभार 

Comment by Meena Pathak on December 11, 2014 at 6:03pm

आदरणीय गिरिराज ...सर बहुत बहुत आभार | सादर 

Comment by Meena Pathak on December 11, 2014 at 6:02pm

आदरणीय नवल किशोर जी बहुत बहुत आभार 

Comment by Meena Pathak on December 11, 2014 at 6:01pm

आदरणीय योगराज सर..रचना पर उपस्थिति के लिए हृदय से आभारी हूँ | सादर 

Comment by Meena Pathak on December 11, 2014 at 5:58pm

बहुत आभार आ० योगेन्द्र जी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 10, 2014 at 11:01pm
आदरणीय मीना जी खूबसूरत रचना। बधाई स्वीकारें।
Comment by Ram Ashery on December 10, 2014 at 10:59pm

congratulation for such a wonderful poem.

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