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"रमलू की घरवाली कौन हैं ? "

"साब मैं हूँ । "

"हम तेरे पति की मौत पर सरकार की तरफ से मुआवजा देने आये हैं, पढना जानती हैं ? "
"जी नही साब, अनपढ़ हूँ । "
"और कौन -कौन है घर में ? "
"साब मैं, 4 छोरिया 1 बेटो है। रमलू तो मर गयो । ये सारो बोझ मारे ऊपर छोड़ गयो । घर की हालत तो थे देख ही रया हो, खाने के लाले है। साब इतनी सर्दी में भी पहनने को कुछ नही ..." सिसकने लगती है ।
"चल ठीक है, रो मत ये......"
" इक मिनट " बात पूरी भी नही हुई थी की सहायक के कान मेँ वो अधिकारी फुसफुसाया ।

"सोच लो , मलाई मिल सकती हैं, "सर अनपढ़ हैं। मुआवजा तो 1 लाख का है । 25000 हजार हम रख लेते है इसे क्या पता लगेगा ? किसी को न बताने की धमकी दे दीजिएगा।"
"हाँ गरीब है चलो 20000 ही काट लेते हैंआखिर इंसानियत भी कुछ होती हैं ।"

मोलिक व् अप्रकाशित

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Comment by vijay nikore on November 24, 2014 at 9:10am

सुन्दर व्यंग्य, सुन्दर लघु कथा। बधाई।


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 23, 2014 at 4:54pm

व्यंगात्मक शैली में प्रस्तुत यह लघुकथा चोट करती है, बधाई किशन कुमार जी।

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 23, 2014 at 10:27am

सुंदर लघु कथा | भ्रष्टाचार में भी इंसानियत दिखाने  की सुंदर कोशिश | वाह 

Comment by विनोद खनगवाल on November 23, 2014 at 10:05am

har taraf bas pesa hi pesa dikh raha hai logon ko. insaniyat to jese khatam hi ho gai hai. bahut hi sarthak laghukatha hai aa. kisan ji. badhai


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 22, 2014 at 6:13pm

बहुत अच्छे विषय पर लिखी लघु कथा ...भ्रष्टाचार का बेहतरीन नमूना ...शानदार व्यंग्य ..हार्दिक बधाई आपको किशन कुमार जी. 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 22, 2014 at 1:54pm

विषय अच्छा है i शिल्प में सुधार  अपेक्षित प्रतीत होता है i

Comment by somesh kumar on November 22, 2014 at 10:53am

भ्रष्टाचारी इसी प्रकार से इंसान बने हुए हैं ,सुंदर व्यंग्य लघुकथा के लिए बधाई 

Comment by Shyam Narain Verma on November 22, 2014 at 9:51am

बहुत सुंदर लघुकथा के लिए हार्दिक बधाई 

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