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खुशनसीब (लघुकथा)

दोनो बचपन की सहेलियाँ शादी होने के बहुत दिनो बाद मिली थीं. सारे दुःख-दर्द बाँटे जा रहे थे.
"मैं बहुत खुशकिस्मत हूँ जो उनके जाने के बाद मुझे रोहन जैसे पति का साथ मिला जो हरपल मेरा ख्याल रखता है." पहली सहेली के चेहरे पर मुस्कान थी।.
"एक पति मेरा है, आधी रात के बाद पी के आता है, और मार-पीट के सो जाता है, ये दारु उसे कहीं ले भी तो नही जाती.
दूसरी की आँखों से बरबस ही आँसू छलक पड़े!

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by Pawan Kumar on November 15, 2014 at 11:51am

आदरणीय योगराज प्रभाकर जी सादर अभिवादन, सस्नेह उत्साहवर्धन व मार्गदर्शन हेतु हार्दिक आभार!

Comment by Pawan Kumar on November 15, 2014 at 11:51am

आदरणीय गनेश जी सादर अभिवादन, उत्साहवर्धन हेतु हार्दिक आभार!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on November 10, 2014 at 1:26pm

आ० पवन कुमार जी 

सहेलियों की आपस की बात को सुन्दरता से प्रस्तुत किया है... लेकिन अभी इस वार्तालाप में कुछ और होना शेष है..ताकि ये लघुकथा मुकम्मल हो सके ..मुझे ऐसा लगा

इस प्रयास के लिए हार्दिक बधाई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 10, 2014 at 5:13am

आ. पवन भाई , आपकी लघुकथा उस नारी की बेबसी को बताने मे सफल रही , दिली बधाई स्वीकारें ।

Comment by somesh kumar on November 9, 2014 at 5:17pm

आप को इस मंच के श्रेष्ठ-गुरुओं का आशीष मिला है ,आप की लघुकथा की सफ़लता इसी बात में है ,बधाई 

Comment by ram shiromani pathak on November 9, 2014 at 2:35pm

पवन भाई  सुन्दर प्रस्तुति अनवरत बढ़ाते रहो //हार्दिक बधाई आपको


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 8, 2014 at 6:17pm

लघु कथा की अंतिम पंक्ति एक बेबस व्यथित हृदय की स्थिति  को खोलती है सच ऐसे पियक्कड़ और अत्याचारी पति के लिए बद् दुआएं ही तो निकलेंगी  मन से और क्या हो सकता है |बढ़िया लघु कथा है बधाई आपको|

Comment by Alok Mittal on November 8, 2014 at 4:50pm

बहुत सुंदर लिखा है आपने मित्र

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on November 8, 2014 at 9:19am

बहुत सुंदर लघुकथा. बधाई आदरणीय पवन भाई


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on November 7, 2014 at 11:02pm

आदरणीय पवन कुमार जी, अंतिम पंक्ति का मर्म मन को छू गया, बधाई....

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