For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

Pawan Kumar's Blog (19)

दिल पे दस्तक

दिल पे दस्तक जो दूँ तो बुला लिजिए

दूर रहने की अब ना सजा दिजिए

मेरे नयनो की आप रोशनी हो बनी

आप बिन कुछ ना देखूँ है खुद से ठनी

ज्योति को यूँ ना दृग से जुदा किजिए

दिल पे दस्तक .......

मद में ही मै भटकता रहा दर-बदर

रास आई तन्हाई मुझे इस कदर

इस तन्हाई को अपना पता दिजिए

दिल पे दस्तक .......

दिल में दर्दे हिज्र की अब तामीर हो रही

ख्वाब में आपके मेरा जिक्र भी नही

दश्ते-बेकसी से अब तो फना किजिए

दिल पे दस्तक…

Continue

Added by Pawan Kumar on May 19, 2016 at 11:30am — 8 Comments

ख्वाब

ख्वाब!

क्या है ये?

एक पल में राजा बना देता है

और दूसरे ही पल ..............

ज्योतिषियों के लिए तो दूर दृष्टी है

और अनाडि़यों के लिए...

फ्री का सनिमा

मेहनतकश के लिए उसकी मंजिल

हमारे और आपके लिए ..........

कभी खुद भी सोच लिया करो!

ख्वाब के रंग कई रुपो में बिखरे हैं

बच्चे, बूढे, जवान

सभी अलग-अलग रुपो में

इसका दीदार करते हैं

कोई परियों के साथ खेलता है तो

किसी को अपना भविष्य नजर आता है

और किसी को उसके परिश्रम का परिणाम

ख्वाब की…

Continue

Added by Pawan Kumar on August 10, 2015 at 5:13pm — 6 Comments

इक-इक पग

डगर कठिन है

मंजिल से पहले पग रुकता है

फिर हौसलों के सहारे

एक-एक पग आगे बढता हूँ

गिरता हूँ, संभलता हूँ

क्या?

मंजिल भी

मेरे इस परिश्रम को देख रही होगी

क्या?

वह भी जश्न मनायेगी

मेरे वहाँ पहुँचने पर

कभी-कभी

ये उत्कण्ठा भी उत्पन्न हो जाती  हैं

फिर विचार आता है!

मंजिल जश्न मनाये या ना मनाये

उसे पा तो लूँगा, उसे चुमूँगा

दुनिया को दिखाउँगा कि

इसी के लिए मैने अथक प्रयास किया है

और अनवरत ही चलता रहता हूँ

इक-इक पग बढाते…

Continue

Added by Pawan Kumar on March 19, 2015 at 7:20pm — 8 Comments

खुशनसीब (लघुकथा)

दोनो बचपन की सहेलियाँ शादी होने के बहुत दिनो बाद मिली थीं. सारे दुःख-दर्द बाँटे जा रहे थे.
"मैं बहुत खुशकिस्मत हूँ जो उनके जाने के बाद मुझे रोहन जैसे पति का साथ मिला जो हरपल मेरा ख्याल रखता है." पहली सहेली के चेहरे पर मुस्कान थी।.
"एक पति मेरा है, आधी रात के बाद पी के आता है, और मार-पीट के सो जाता है, ये दारु उसे कहीं ले भी तो नही जाती.
दूसरी की आँखों से बरबस ही आँसू छलक पड़े!

"मौलिक व अप्रकाशित"

Added by Pawan Kumar on November 6, 2014 at 2:30pm — 24 Comments

हाइकु

(1)

मोहक वन
सरि की कलकल
बहका मन

(2)

कोयल प्यारी
नित कूँ कूँ करती
जान हमारी

(3)

कार्तिक मास
झूम रही धरती
बुझेगी प्यास

(4)

यात्रा में रेल
दौड़ता सबकुछ
लगता खेल

(5)

मनवा भावे
सुन्दर है नईया
वायु हिलोर

"मौलिक व अप्रकाशित" 

Added by Pawan Kumar on October 30, 2014 at 6:00pm — 12 Comments

अपनी दिवाली (लघुकथा)

"माँ ! आज मैं सुबह ही सभी के घर जाकर,  दियो में बचे हुए तेल इकठ्ठा कर लाया हूँ,
आज तो पूड़ी बनाओगी ना? "

"मौलिक व अप्रकाशित"

Added by Pawan Kumar on October 18, 2014 at 3:30pm — 14 Comments

हास्य (तुकांत)

प्रथम प्यार की आस में

मैने किया प्रयास

सजनी एट्टीट्यूड में

तनिक न डाले घास

पोथी पढ़कर प्यार की

तनिक न असर बुझाय

जब-जब भी कोशिश किया

चप्पल-जूताखाय



हर महफिल हर रंग में

चेहरा जिसका भाय

उसने राखी बाँध के

भाई लिया बनाय



घरवालों की मान के

डाल दिया जयमाल

दो दो मेरे सालियाँ

पकड़ के खीचें गाल

मारा-मारा फिर रहा

जबसे हुआ विवाह

बीबी ऐसी मिल गई

रहती…

Continue

Added by Pawan Kumar on October 13, 2014 at 12:00pm — 8 Comments

स्नेह की छाँव (लघुकथा)

" बेटा, तुम जब भी शहर से आते हो तो घर में कम और इस पेंड़ के पास ज्यादे समय बिताते हो, घर में मन नही लगता क्या..."

" चाचा, यहाँ बड़ा सुकून मिलता है! याद है आपको जब मैं नर्सरी में पढता था! एक बार वहाँ पौधशाला वाले पौधे बाँट रहे थें, ये आम का पेंड़ मैं वहीं से लाया था, पिता जी पौधों के प्रति मेरा प्रेम देखकर बहुत खुश हुए थें!  इसे उन्होने अपने हाथों से लगाया था और खाद-पानी भी समय-समय से दिया करते थें! इसे वे बहुत प्यार करते थें,  इसीलिए कुछ पल इसकी छाया में बिताना, पिता जी के स्नेह की…

Continue

Added by Pawan Kumar on October 8, 2014 at 12:30pm — 16 Comments

तो क्या बात हो

अपने जज्बात दिखाओ तो क्या बात हो

खुल के हर बात बताओ तो क्या बात हो

सभी ने दिन में हैं तारे ही दिखाये मुझको

तुम कभी चाँद दिखाओ तो क्या बात हो

वो अकेला ही चल पड़ा राहे-सच्चाई

दो कदम साथ मिलाओ तो क्या बात हो

मेरे…

Continue

Added by Pawan Kumar on October 6, 2014 at 5:30pm — 4 Comments

अब ऐसा क्यूँ होता है

मिलती है तूँ ख्वाबो में,
अक्सर ऐसा क्यूँ होता है!
तेरी यादों के घेरे में,
ये दिल चुपके से रोता है!
आँखों का भी क्या कहना,
ना जाने कब सोता है!
दीदार तेरे कब होंगे,
सपने यही संजोता है!
मन रहता है विचलित सा,
क्या पाया, क्या खोता है!
तन भी लगता है मैला
पापो की गठरी ढ़ोता है!
खुद की भी परवाह नही,
अब ऐसा क्यूँ होता है!!

"मौलिक व अप्रकाशित"

Added by Pawan Kumar on October 1, 2014 at 10:30am — 6 Comments

हाइकु

(1)

रे दुराचारी
देख ना आयी शर्म
अबला नारी


(2)

बन सबला
कर नाश दुष्टों का
नारी अबला


(3)

नन्ही सी जान
खिलखिला देती थी
आज बेजान


(4)

मन को भाया
घने धूप में पंथी
वृक्ष की छाया


(5)

सांस की जान
काट रहे नादान
होते बेजान

"मौलिक व अप्रकाशित"

Added by Pawan Kumar on September 29, 2014 at 1:00pm — 12 Comments

पछतावा (लघुकथा)

"भईया,  तुम ऐसा क्यों करते हो, अब तो मेरी सहेलियाँ भी कहती हैं कि तेरा भाई और उसके दोस्त बड़े गन्दे हैं, रास्ते में भद्दे-भद्दे कमेन्ट्स करते हैं"

सन्ध्या अपने भाई से नाराज होते हुए बोली! रोहन उसकी बात को अनसुना करके चला गया। शाम होते ही फिर वह और उसके दोस्त बस स्टाफ की तरफ निकलें, वहां  एक लड़की बस का इन्तजार कर रही थी, चेहरा दुपट्टे से ढका था, उसे देखते ही रोहन कमेन्ट्स करते हुए उसका दुपट्टा खींच लिया, देखा तो अवाक रह गया,…

Continue

Added by Pawan Kumar on September 25, 2014 at 12:00pm — 16 Comments

अनोखा ममत्व (लघुकथा)

आज पूरे दो वर्ष बाद बेटा घर आया था, माँ कि पथराई आँखों में जैसे खुशियों का शैलाब उमड़ पड़ा हो। रमेश अपने माँ-बाप का इकलौता बेटा था। शादी होने के बाद पत्नी को लेकर शहर में ही रहने लगा था। घर पर पैसा बराबर भेजता रहता था, पर पैसो में वो आत्मसुख कहा जो अपने आँख के तारे के पास होने में है। दो दिन किसी तरह रहने के बाद ही वह वापस जाने की जिद करने लगा। नौकरी छोड़ के आया हूँ, बीबी अकेली है, छुट्टी कम ही मिली है, फिर जल्दी ही आ जाऊँगा, तमाम बहाने बनाने लगा। माँ बाप भी बेबस थें, बेचारे क्या करतें,…

Continue

Added by Pawan Kumar on September 4, 2014 at 5:00pm — 13 Comments

क्षणिकाएँ (पवन कुमार)

1-मेरी अधूरी कहानी
बस इतनी सी है,
मैं ढूढता रहा
वो मिला ही नही।

2-बंद आँखों से
सिर्फ वो नजर आता है,
एकदम खुशनुमा,
सुबह की पहली किरण की तरह।

3-प्यार में उससे,
सबकुछ मिला,
सिर्फ
प्यार के सिवा।

4-तुम्हे
याद करना,
पास होने जैसा ही तो है,
फर्क बस इतना है कि,
यादों में तुम साथ होते हो,
और पास होने पर दूरी बनी रहती है।

"मौलिक व अप्रकाशित"

Added by Pawan Kumar on September 4, 2014 at 11:00am — 1 Comment

घर और मायका (लघुकथा)

किचेन से रश्मि की आवाज आई ...... भाभी जरा मेरे कपड़े धुल देना, खाना बनाने के बाद धुलुंगी तो काॅलेज के लिए देर हो जायेगी! इतना सुनते ही सुमन का जैसे पारा गरम हो गया ...... बड़बड़ाते हुए बोली... सभी ने जैसे नौकर समझ लिया है, कुछ ना कुछ करने के लिए बोलते ही रहते हैं, आराम से टी0वी0 भी नही देखने देतें ........ देखिये जी ! अगर इसी तरह चलता रहा तो मैं मायके चली जाउँगी, मेरी भाभी बहुत अच्छी हैं, घर का सारा काम करती हैं,  वहाँ मुझे कुछ नही करना पड़ता, और मैं आराम से टी0वी0…

Continue

Added by Pawan Kumar on August 28, 2014 at 6:06pm — 8 Comments

हाइकु

प्रेम धुन

प्रिय मोहन

नाचत मन राधा

वेणुका धुन

विरह

टूटती आस

साजन घर नाहीं

फागुन मास…

Continue

Added by Pawan Kumar on August 26, 2014 at 1:30pm — 12 Comments

कि तेरी याद आती है

चले आओ कभी आगोश में,

सब छोड़ के जालिम!

ये रातें कट रही तन्हा,

कि तेरी याद आती है।

बताऊँ फिर तुझे कैसे,

दिल-ए-नादाँ की बातें!

मैं खुद में हो गया आधा,

कि तेरी याद आती है।

कभी रहती थी पलकों पे,

हुस्न-ए-नूर बनकर तुम!

वही बनके तूँ फिर आजा,

कि तेरी याद आती है।

समय बदला, फिजा बदली,

अभी ये दिल नही बदला!

समय के साथ तूँ बदली,

कि तेरी याद आती है।

सोचता हूँ समेटूँगा,

तेरी यादों…

Continue

Added by Pawan Kumar on August 21, 2014 at 3:30pm — 20 Comments

प्रिय मोहन

प्रिय मोहन तेरे द्वार खड़ी मैं,

कबसे से रही पुकार!

कान्हा मुझको शरण में ले लो,

विनती बारम्बार।

मैं तो अज्ञानी, अभिलाशी,

तेरे दरश की प्यारे!

जीवन पार लगा दो मेरा,

बस मन यही पुकारे।

खुशियों से भर दो ये झोली,

ओ मेरे साँवरिया!

तेरे पीछे दौड़ी आऊँ,

बन के मैं बाँवरिया।

मोह रहे हैं मन को मेरे,

श्याम तेरे ये नयना!

दिन में सुकून ना पाऊँ तुम बिन,

रात मिले ना चैना।

मुझ अबला को सबला कर दो,

जग…

Continue

Added by Pawan Kumar on August 19, 2014 at 1:14pm — 8 Comments

लक्ष्य हमारा

आकाश में उड़ने की चाह लिये

कल्पना रूपी पंखों को फैलाने की कोशिश करता हूँ

पर

अक्सर नाकाम होता हूँ

उस ऊँची उड़ान में,

फिर भी आस लगाये रहता हूँ

कि कभी तो वो पर निकलेंगे

जो मुझे ले जायेंगे

मेरे लक्ष्य की ओर,

और अनवरत ही

बढता जाता हूँ

अथक प्रयास करते हुए

सुनहरे ख्वाब की ओर अग्रसर करने वाले पथ पर।…

Continue

Added by Pawan Kumar on August 13, 2014 at 12:30pm — 8 Comments

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

आशीष यादव replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय श्री अशोक कुमार जी इस कजरी पर टिप्पणी के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद।  आज के परिवेश…"
Monday
Ashok Kumar Raktale replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय आशीष यादव जी सादर, सावन की सुंदर और मधुर  फुहारों में यह कजरी की प्रस्तुति  बहुत…"
Monday
vijay nikore posted a blog post

सांकल मन के द्वार पर

सांकल मन के द्वार परजब-जब जहाँ कहीं फूल खिलेतुझे याद किया था हमने ... "क्या...तुम्हारे मन के द्वार…See More
Monday
आशीष यादव added a discussion to the group भोजपुरी साहित्य
Thumbnail

कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी)

काहें सावन में देला अइसे शॉक पिया कइके हमके ब्लाॅक पिया ना …….. मनवा तोहके पुकारे नैना फोनवा…See More
Sunday
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

हरिगीतिका छंद

  हरि नाम लो हरि नाम लो हरि, नाम लो  हरि नाम लो।यह नाम  ही  है  सत्य  मानव,  भोर लो नित शाम…See More
Jul 24
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी जी सादर,  चौपाइयों की इस प्रस्तुति पर उत्साहवर्धन के लिए आपका हृदय से…"
Jul 24
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत चौपाइयों की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार. जी !…"
Jul 24
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक - - - - शोखी

दोहा पंचक. . . . . शोखीशोख उमर की शोखियाँ, चंचल दृग संकेत ।भीगा यौवन मद भरा, दिल को करे अचेत…See More
Jul 21

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय अशोक भाईजी, वर्षा ऋतु, विशेषकर सावन मास, के नम क्षणों का रागात्मक वर्णन रोचक बन पड़ा है.…"
Jul 20
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आ. भाई अशोक जी, सादर अभिवादन। पावस पर सुंदर चौपाइयों की रचना हुई है। हार्दिक बधाई।"
Jul 18
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

चौपाइयाँ

दोहाबरखा के बढ़ते क़दम, आये  हैं  अब पास।दूर नहीं है साजना, सुरभित सावन मास।। चौपाईवह फुहार वह साथ…See More
Jul 14
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"  आदरणीय चेतन प्रकाश साहब सादर नमस्कार, यही तो मुख्य है विषय है इस रचना का. नदी नहीं उफ़नाई है.…"
Jul 14

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service