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क्षणिकाएँ...

1.घन गरजे घनघोर
तिमिर चहुँ ओर
तृण-तृण से तन बहे
करके सब कुछ शांत
मेह हो गया शांत

..........................

2. सावन की फुहार
सृजन की मनुहार
रंगों का अम्बार
आयी बहार
हुआ धरा का
पुष्पों से शृंगार

.......................

3.बुझ गयी
कुछ क्षण जल कर
माचिस की तीली सी
जंग लड़ती साँसों से
असहाय ये काया

.........................

4.हर शाख पर
शूल ही शूल
फिर भी महके
शूल शय्या पर
जीवन बन
सुर्ख गुलाब

..........................

5.स्वयं से अंजान
स्वयं की पहचान
स्वयं को जान
झाँक स्वयं को
स्वयं में सिमटा
जीवन-मरण का 
शाश्वत ज्ञान

6.चिलचिलाती धूप में
तालियों के शोर में
करतब दिखाती बच्ची
रस्सी से गिर पड़ी
साँसों से संघर्ष भी
भीड़ को करतब लगा
सिक्के उछलते रहे
डुगडुगी बजती रही
इक रोटी की आस में

भूख मगर सिसकती रही

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by khursheed khairadi on November 3, 2014 at 10:24am

बुझ गयी 
कुछ क्षण जल कर 
माचिस की तीली सी 
जंग लड़ती साँसों से 
असहाय ये काया

आदरणीय शुशील साहब भावपूर्ण एवं मार्मिक क्षणिकाएं हैं |सादर अभिनन्दन 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 3, 2014 at 9:44am

सभी क्षणिकाएँ अपने अन्दर सच को छुपाये बहुत भावपूर्ण हैं अंतिम तो बहुत मार्मिक ...बहुत बहुत बधाई आपको आ० सुशील सरना जी 

Comment by Sushil Sarna on November 2, 2014 at 12:38pm

आदरणीय शिज्जु शकूर साहिब क्षणिकाओं पर आपकी मोहक प्रतिक्रिया का हार्दिक आभार। 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on November 2, 2014 at 7:18am

बहुत ही भावपूर्ण रचना है आदरणीय सुशील सर बधाई स्वीकार करें

Comment by Sushil Sarna on November 1, 2014 at 7:37pm

आदरणीया  Chhaya Shukla क्षणिकाओं पर आपकी स्नेहिल  प्रशंसा का हार्दिक आभार 

Comment by Sushil Sarna on November 1, 2014 at 7:36pm

आदरणीय   Dr. Vijai Shanker  क्षणिकाओं पर आपकी आत्मीय प्रशंसा का हार्दिक आभार 

Comment by Chhaya Shukla on November 1, 2014 at 6:22pm

बड़े ही गहरे भाव समेटे हैं आपने क्षणिकाओं में आ. सुशील सरना जी हार्दिक बधाई आपको !

Comment by Dr. Vijai Shanker on November 1, 2014 at 4:07pm

बहुत सुन्दर क्षणिकाएँ , अंतिम दो तो , बस छू लेती हैं अंतर्मन को।  बहुत बहुत बधाई आदरणीय सुशील सरना जी।  

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