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आसमानी फ़ासले .... (विजय निकोर)

आसमानी फ़ासले

बच्चों-सा स्वप्निल स्वाभाविक संवाद

हमारी बातों में मिठास की आभाएँ

ताज़े फूलों की खुशबू-सी निखरती

सुखद अनुभवों की छवियाँ ...

हो चुकीं इतिहास

समय-असमय अब अप्रभाषित

शून्य-सा मुझको लघु-अल्प बनाती

अस्तित्व को अनस्तित्व करती

निज अहं को आदतन संवारती

आलोचनाशील असंवेदनशीलता तुम्हारी

अब बातें हमारी टूटी कटी-कटी ...

बीते दिनों की स्मर्तियाँ पसार

मानवीय उलझनों के पठार

कर देते बेहद उदास

टूटे विश्वासों के विक्षोभों की अनथक गहरी पीर

इस पर भी सौन्दर्य-संध्या में मंदिर में

तुम्हारे लिए नित्य अनवरत अनंत प्रार्थना

सुख की याचना

अकेली-सुनसान रातों जलती है ढिबरी

राख रिश्ते की वीरानी

हथेली पर अशेष

जलते गर्म फफोले

तुम्हारी पहचान से अनदेखी

चट्टानी चोट

ज़िन्दगी की दलदल

फूटते कसकते बुलबुले

ठोकर से अकुलाते

पैर-अंगूठे के उखड़े नख का दर्द ...

--------

-- विजय निकोर

(मौलिक व अप्रकाशित)

Views: 887

Comment

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Comment by vijay nikore on October 8, 2014 at 7:01am

//Nostalgia का भी अपना महत्त्व है i उसमे कसक है , पीड़ा है  और निर्वेद भी//

कविता के मर्म को आपके शब्दों ने आंगिकार किया है। आपका हार्दिक धन्यवाद आदरणीय गोपाल नारायन जी।

Comment by vijay nikore on October 8, 2014 at 6:58am

//खूबसूरत भावों से रची इस रचना के लिए हार्दिक बधाई//

रचना की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय आशुतोष जी।

Comment by Priyanka singh on September 11, 2014 at 9:39pm

अकेली-सुनसान रातों जलती है ढिबरी

राख रिश्ते की वीरानी

हथेली पर अशेष

जलते गर्म फफोले......कितना दर्द है इनमें कितनी सारी यादें उभर आती है एक साथ....आपका लेखन हर बार नया और अद्भुत होता है ....बहुत बहुत गहरी रचना और उसके अनकहे भाव ....बहुत बहुत बधाई और नमन आपको ....

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on September 11, 2014 at 5:33pm

बीते दिनों की स्मर्तियाँ पसार

मानवीय उलझनों के पठार

कर देते बेहद उदास

टूटे विश्वासों के विक्षोभों की अनथक गहरी पीर

इस पर भी सौन्दर्य-संध्या में मंदिर में

तुम्हारे लिए नित्य अनवरत अनंत प्रार्थना

सुख की याचना

उम्मीद पर दुनिया कायम है ...इसलिए प्रयास जरूरी है. सुन्दर रचना आदरणीय विजय निकोर जी.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on September 10, 2014 at 9:53am

फिर से एक पठनीय रचना आपकी और से आई , कुछ देर ठिठकने को मजबूर करती सी ..बहुत- बहुत बधाई आ० विजय निकोर जी 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on September 10, 2014 at 9:46am

आपकी सभी रचनाए वेदना भरे स्वर लिए रची होती है फिर चाहे वह अभिव्यक्ति विगत के काल के ग्रास से निकली हो या

स्वप्निल विचारों का प्रवाह बन उभरी हो | यह रचना भी निर्वाद रूप से उसकी कड़ी में जुडती है | हार्दिक बधाई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 9, 2014 at 8:59pm

आदरणीय बड़े  भाई विजय जी , बहुत सुन्दर लगी आपकी रचना , दिली बधाई स्वीकार करें |

Comment by ram shiromani pathak on September 8, 2014 at 10:42pm
वाह आदरणीय क्या कहूँ बस आपकी रचनाये हमेसा चमत्कृत करती है और एक बात 5 6 बार पढना तो बनता है।।बहुत बहुत आभार साझा करने के लिए।।सादर

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by sharadindu mukerji on September 8, 2014 at 6:30pm

श्रद्धेय,

बहुत दिनों बाद आपकी रचना पर प्रतिक्रिया दे रहा हूँ...इसलिए नहीं कि आपकी रचनाएँ पढ़ता नहीं हूँ....इसलिए कि पढ़कर अभिभूत हो जाता हूँ, अपनी लेखनी अशक्त हो जाती है. आज भी कुछ कहने से सकुचा रहा हूँ. समय के साथ इंसानी व्यवहार के बदलते अंदाज़ को जिस  कलात्मक अंदाज़ से आपने चित्रित किया है उसमें एक ही साथ आँखों से आँसू और होठों के कोर से तिर्यक मुस्कान को टपकते हुए देख रहा हूँ. साधुवाद...आपकी लेखनी को नमन. सादर. 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 8, 2014 at 1:13pm

आदरणीय निकोर जी

सुखद अनुभवों की छवियाँ ...

हो चुकीं इतिहास--------------------- और फिर

बीते दिनों की स्मर्तियाँ पसार

मानवीय उलझनों के पठार

कर देते बेहद उदास

Nostalgia का भी अपना महत्त्व है i उसमे कसक है , पीड़ा है  और निर्वेद भी i  सादर i

 

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