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मिला कंधा नहीं हमको पड़ी है लाश ठेले में

खिलाया क्यों ज़हर तुमने मिला कर हम को केले में

चली आ तू बहाने से मिलेगें आज हम दोनो
न आई तो समझ लेना फसा देगें झमेले में

न आती थी हमें नीदें कहें जब तक न गुडनाइट
किये हम रात भर बाते दिया जो फोन मेले में

पहन कर लाल जोड़ा तुम चली हो साथ क्‍याे उनके
करे हम ये दुआ रब से रहे तू तो तबेले में

सजाई मॉंग क्‍यों अपनी तड़पता छोड़ तू हमको
बहुत हम याद आयेगें रहोगी जब अकेले में

मौलिक एवं अप्रकाशित अखंड गहमरी

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Comment

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Comment by Akhand Gahmari on September 7, 2014 at 11:55am

हम आपके मार्गदर्शन एवं उत्‍साहवर्धन्‍ा के सदैव आकांक्षी है मेरा प्रणाम स्‍वीकार करें आदरणीय सौरभ पाड़े जी


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on August 26, 2014 at 11:14pm

हास्य पर बढ़िया प्रयास हुआ है 

हार्दिक बधाई आ० अखंड गहमरी जी 

Comment by विजय मिश्र on August 26, 2014 at 6:16pm
खूब , बधाई }
Comment by Pawan Kumar on August 26, 2014 at 6:00pm


हास्य रस से लबरेज प्रस्तुति
सादर बधाई


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 25, 2014 at 8:46pm

आ. अखंड भाई , खूब सूरत ग़ज़ल हुई है , बधाइयां |

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 25, 2014 at 11:20am

आदरणीय भाई अखंड गहमरी जी , इस हास्यपूर्ण पर यथार्थवादी गजल के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by Meena Pathak on August 25, 2014 at 5:54am

बहुत सुन्दर ...बधाई आ० अखंड जी 

Comment by कल्पना रामानी on August 24, 2014 at 10:54pm

वाह, वाह!! बहुत खूब! बढ़ी आपको आ॰ अखंड जी 

Comment by savitamishra on August 24, 2014 at 10:18pm

hhhhhhhhhhhh बहुत बढ़िया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on August 24, 2014 at 9:35pm

हाहाहा ...अच्छी हास्यरस में लिपटी ग़ज़ल बहुत खूब ...

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