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"मैं अपने ही साथ रहूँगा"

मैं अपने ही साथ रहूँगा!
खुद में तुझसे बात करूँगा!!

अब चाहे  जिससे मिलना हो!
दर्पण अपने साथ रखूँगा!!

मेरे कद को ढाँक सके जो !
ऐसी चादर साथ रखूँगा!!

उनको हँसकर मिलने तो दो!
मैं भी दिल की बात करूँगा!!

बातें बहुत ज़बानी कर लीं!
मैं भी खत इक बार लिखूँगा!!
*****************************

राम शिरोमणि पाठक"दीपक"
मौलिक/अप्रकाशित

Views: 530

Comment

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Comment by ram shiromani pathak on August 13, 2014 at 5:45pm

हार्दिक आभार आदरणीय विजय निकोर जी ...............   सादर 

Comment by vijay nikore on August 13, 2014 at 10:59am

बहुत ही सुन्दर गज़ल बनी है। हारदिक बधाई।

Comment by ram shiromani pathak on August 12, 2014 at 1:42pm

उत्साह वर्धन अनुमोदन व् अमूल्य सुझाव हेतु आपका बहुत बहुत आभारी हूँ आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी  ......... सादर 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 12, 2014 at 1:15pm

राम भाई, इस ग़ज़ल से आपने हमें एकदम से खुश कर दिया है. शेर कहन से बहुत ही गहन हैं, लेकिन क्या चलते-फिरते लहजे में अपनी बातें कह रहे हैं ! बहुत खूब !

इन दो शेरों के लिहाज पर जितना कहूँ, कम होगा.

अब चाहे  जिससे मिलना हो!
दर्पण अपने साथ रखूँगा!!

मेरे कद को ढाँक सके जो !
ऐसी चादर साथ रखूँगा!!

बहुत-बहुत बधाइयाँ !

अलबत्ता, निम्नलिखित शेर को मैं अपनी तरफ से यों परिवर्तन कर पढ़ रहा हूँ. नहीं, मैं परिवर्तन की बात नहीं कर रहा हूँ. यह बस मेरी व्यक्तिगत सोच भर है -
उनको हँसकर मिलने तो दो !
मैं भी हँस कर बात करूँगा !!

Comment by ram shiromani pathak on August 12, 2014 at 12:28pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय भाई लक्ष्मण जी....  सादर  

Comment by ram shiromani pathak on August 12, 2014 at 12:27pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय जीतेन्द्र जी 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 12, 2014 at 12:09pm

आ० भाई रामशिरोमणि जी , इस बेहतरीन ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई .

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on August 12, 2014 at 10:08am

मेरे कद को ढाँक सके जो !
ऐसी चादर साथ रखूँगा!!...........सही निर्णय

बहुत -२ बधाई आपको आदरणीय राम भाई

Comment by ram shiromani pathak on August 11, 2014 at 10:53pm
Hardik aabhar savita g... Saadar
Comment by savitamishra on August 11, 2014 at 3:35pm

बहुत ही सुन्दर

कृपया ध्यान दे...

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