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१-ये कैसा दर्पण
जिसमे सबकुछ
मुझसा ही दिखता है

२-मेरी मर्ज़ी
उनके लम्हे भर का क़र्ज़
जीवन भर लौटाऊँ  

३-वो सबकी नज़रों में था
लेकिन खुद को ही नहीं देख पाया

४- पहले मुझे ज़िंदा करो
फिर मरने की बात करना

५-उन्हें हँसी तो आयी
 बहाना
मेरा रोना ही सही

६-देखते है
ज़िंदा रहने की धुन में
खुद को कितनी बार मारता है वो

७-मैं
मैख़ाने का रास्ता भूल जाऊँ
इसलिए आज
वो आँखों से पिला रही है
****************************
मौलिक/अप्रकाशित
राम शिरोमणि पाठक"दीपक"

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Comment by ram shiromani pathak on August 11, 2014 at 10:46am

उत्साह वर्धन हेतु बहुत बहुत आभार आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी। ।   सादर

Comment by ram shiromani pathak on August 11, 2014 at 10:45am

बहुत बहुत आभार भाई नीरज मिश्रा जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 10, 2014 at 1:58am

रामशिरोमणिजी, मुझे सभी क्षणिकायें अत्यंत सुगढ़ लगी हैं.  सबके भावार्थ की आवृति भिन्न होने के बावज़ूद इनका प्रभाव विन्दुवत है.

सभी के लिए अलग-अलग बधाइयाँ.

Comment by Neeraj Nishchal on August 9, 2014 at 3:10pm

आदरणीय पाठक जी आपकी क्षणिकाओं में आपकी जो दार्शनिक प्रतिभा झलकती है
वह सच में ही अद्भुत है बहुत बहुत बधाई प्रेषित करता हूँ इतने सुन्दर भावों के लिए ।

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