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बहुत सोचा तुम्हें आखिर भुला दूँ मैं-ग़ज़ल

1222/ 1222/ 1222

बहुत सोचा तुम्हें आखिर भुला दूँ मैं

जले लौ तो उसे खुद ही हवा दूँ मैं

 

उदासी का सबब गर पूछ लें मुझसे

अज़ीयत के निशाँ उनको दिखा दूँ मैं

 

कभी सागर कभी सहरा कभी जंगल

यूँ क्या-क्या बेख़याली में बना दूँ मैं

 

हक़ीकत तो बदल सकती नहीं फिर क्यों

गुजश्ता उन पलों को अब सदा दूँ मैं     

 

तुम्हारी कुर्बतों के छाँटकर लम्हे

किताबों का हर इक पन्ना सजा दूँ मैं

 

इन आँखों से टपकती बून्दों को इक-इक

समंदर में गिरा कर फिर बहा दूँ मैं

 

(मौलिक व अप्रकाशित)

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on July 28, 2014 at 8:19am

आदरणीय  विजय निकोर सर आप जैसे वरिष्ठ सदस्यों की सराहना से बहुत हौसला मिलता है आपका हार्दिक आभार 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on July 28, 2014 at 8:18am

आदरणीय सुशील सरना सर रचना की सराहना एवं इज़्ज़तअफ़्ज़ाई के लिये मैं आपका तहेदिल से शुक्रगुज़ार हूँ

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 27, 2014 at 7:52pm

behtareen---

कभी सागर कभी सहरा कभी जंगल

यूँ क्या-क्या बेख़याली में बना दूँ मैं

 

हक़ीकत तो बदल सकती नहीं फिर क्यों

गुजश्ता उन पलों को अब सदा दूँ मैं     

 

तुम्हारी कुर्बतों के छाँटकर लम्हे

किताबों का हरिक पन्ना सजा दूँ

Comment by Dr. Vijai Shanker on July 27, 2014 at 5:37pm
बहुत सोचा तुम्हें आखिर भुला दूँ मैं
जले लौ तो उसे खुद ही हवा दूँ मैं
बहुत अच्छा है , बधाई।
Comment by vijay nikore on July 27, 2014 at 3:52pm

//

बहुत सोचा तुम्हें आखिर भुला दूँ मैं

जले लौ तो उसे खुद ही हवा दूँ मैं

 

उदासी का सबब गर पूछ लें मुझसे

अज़ीयत के निशाँ उनको दिखा दूँ मैं//

सभी खयाल एक-से-एक बढ़ कर। दिल से दाद देता हूँ।

 

Comment by Sushil Sarna on July 27, 2014 at 3:05pm

बहुत सोचा तुम्हें आखिर भुला दूँ मैं
जले लौ तो उसे खुद ही हवा दूँ मैं

उदासी का सबब गर पूछ लें मुझसे
अज़ीयत के निशाँ उनको दिखा दूँ मैं

गज़ब गज़ब गज़ब … नतमस्तक हूँ आपकी कलमगिरी पर आदरणीय शिज्जु शकूर साहिब … इस बेहतरीन प्रस्तुति के लिए इस नाचीज़ की दिली दाद कबूल फरमायें … आपकी शान में चंद लाइनें पेश है :

किस अशआर की बात करूँ
आखिर किसका लूं में नाम
हर  अशआर  में है महकता
मुहब्बतों   से  भरा   पैगाम

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