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"अरे बेटा , कैसे खा लिया तुमने उस ठेले से समोसा और पानी पूरी ? तुम तो जानते नहीं कि कितने गंदे हाथ होते हैं उनके और कैसा पानी और तेल इस्तेमाल करते हैं वो लोग"! मम्मी परेशान थीं और पापा चिंतित |
बड़े भाई ने भी टोक दिया "तुमसे ये उम्मीद नहीं थी, तुम तो मेडिकल के छात्र हो" |
"लेकिन मम्मी, मुझे भूख बहुत लगी थी"|
अब सब खामोश थे |

.
(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by विनय कुमार on July 22, 2014 at 11:50pm

आभार राजेश कुमारीजी..


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 22, 2014 at 7:25pm

लघु कथा एक तरह से माता पिता पर भी ऊँगली उठा रही है कि बेटा भूखा क्यूँ है ? फिर भूख तो इंसान को मजबूर कर देती है कहाँ कुछ सोचने देती है |डॉ गोपाल नारायण जी की कहावत यहाँ फिट बैठती है |बहुत- बहुत बधाई आपको इस लघु कथा के लिए 

Comment by विनय कुमार on July 22, 2014 at 6:46pm

आभार लक्ष्मण प्रसादजी..

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on July 22, 2014 at 10:47am

अच्छी लघु कथा हुई है | हार्दिक बधाई 

Comment by विनय कुमार on July 22, 2014 at 3:16am

आभार सौरभ पाण्डेय जी..


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 22, 2014 at 2:23am

आदरणीय विनयजी,
आपकी एक और अच्छी लघुकथा के लिए हार्दिक बधाई. लघुकथा का शिल्प क्या आप मर्म समझते हैं.

उस हिसाब से प्रस्तुति के अंतिम वाक्य की आवश्यकता ही नहीं थी.

बहरहाल, हार्दिक शुभकामनाएँ ..

Comment by विनय कुमार on July 21, 2014 at 9:40pm

आभार मीनाजी , मंजरीजी , सुभ्रांशुजी एवम संतलालजी |

Comment by Meena Pathak on July 20, 2014 at 8:33pm

बहुत सुन्दर ...बधाई 

Comment by mrs manjari pandey on July 20, 2014 at 7:17pm
आदरणीय विनय कुमार जी सही बात है भूख लगने पर तो कुछ दीखता नहीं। यथार्थ लघुकथा के लिए हार्दिक बधाई।
Comment by Shubhranshu Pandey on July 20, 2014 at 11:40am

आदरणीय विनय जी, 

एक पुरानी कहावत है. भूख ना जाने जूठा भात, प्यास न जाने धोबी घाट, नींद न जाने टूटी खाट, ......

सुन्दर कथा...बधाई..

सादर.

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