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ग़ज़ल : सदा संदेह से बरसों का बंधन टूट जाता है

बह्र : हज़ज़ मुसम्मन सालिम

मुलायम फूल सा हो दिल या दरपन टूट जाता है,
सदा संदेह से बरसों का बंधन टूट जाता है,

जमीं जब रार बोती है सगे दो भाइयों में तो,
मधुर संबंध आपस का पुरातन टूट जाता है,

तुम्हारी याद में मैया मैं जब आंसू बहाता हूँ,
दिवारें सील जाती हैं कि आँगन टूट जाता है,

पृथक प्रारब्ध ने हमको किया है जानता हूँ पर,
विरह की वेदना में जूझके मन टूट जाता है,

भले अभिमान करती हों स्वयं पे खूब बरसातें,

झड़ी नैनों की लगती है तो सावन टूट जाता है,

समस्याओं से होता है नहीं विचलित कभी लेकिन,
क्षुधा औ प्यास बढ़ती है तो निर्धन टूट जाता है,

खड़ा रणक्षेत्र में बेहद भले हो शत्रु बलशाली,
समझदारी व साहस हो तो दुश्मन टूट जाता है.

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 15, 2014 at 6:24pm

एक कामयाब और अनुभवों से भरी ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई, आदरणीय

Comment by Madan Mohan saxena on July 9, 2014 at 3:55pm

समस्याओं से होता है नहीं विचलित कभी लेकिन,
क्षुधा औ प्यास बढ़ती है तो निर्धन टूट जाता है,

खड़ा रणक्षेत्र में बेहद भले हो शत्रु बलशाली,
समझदारी व साहस हो तो दुश्मन टूट जाता है.

बहुत सुन्दर गजल ,हार्दिक बधाई

Comment by अरुन 'अनन्त' on July 9, 2014 at 1:57pm

आदरणीय निलेश भाई जी आपका हार्दिक आभार ग़ज़ल पर समय देने हेतु एवं सराहना हेतु.

मेरे निम्न ज्ञान के अनुरूप क्षुधा का अर्थ भूख से होता है कदाचित मैं गलत हूँ. इस अशआर में मैं गरीब की भूख और प्यास की बात कर रहा हूँ जोकि आप भली भांति समझते हैं.

Comment by अरुन 'अनन्त' on July 9, 2014 at 10:40am

आदरणीय शिज्जु भाई जी बहुत बहुत शुक्रिया ग़ज़ल आपको पसंद आई सफल हुई.

Comment by अरुन 'अनन्त' on July 9, 2014 at 10:39am

आदरणीया राजेश माँ जी हृदयतल से बहुत बहुत शुक्रिया ग़ज़ल पर आपका आशीष प्राप्त हुआ ग़ज़ल सफल हुई.

Comment by अरुन 'अनन्त' on July 9, 2014 at 10:39am

आदरणीय आशुतोष सर प्रत्येक अशआरों पर समीक्षात्मक टिपण्णी हेतु बहुत बहुत आभार स्नेह यूँ ही बनाये रखिये


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 9, 2014 at 10:39am

आदरनीय अरुण अननत भाई , हर शे र जीवन की एक एक सच्चाई बयान कर रहा है ॥ पूरी गज़ल बहुत सुन्दर हुई है । बधाइयाँ ॥

Comment by अरुन 'अनन्त' on July 9, 2014 at 10:38am

आदरणीया गीतिका जी हार्दिक आभार आपका ग़ज़ल पर समय देने हेतु, आदरणीया जब मैंने यह शे'र लिखा था तो मेरे दिमाग में केवल यही एक बात थी.

जब मैं माँ की यादों में फूट-२ कर रोता हूँ तो मेरे आसुओं से दीवारों में सीलन आ जाती और मेरी सिसक को सुनकर वह आँगन जो माँ से ही सम्पूर्ण होता है, तुलसी एवं फूलों के अनेक रंगों से हरा भरा रहता था आज सूखा हुआ है वह टूट जाता है. टूटने का अर्थ यहाँ तोड़ फोड़ से नहीं है. आशा मैं अपनी बात आप तक पहुंचा पाया हूँ.

Comment by अरुन 'अनन्त' on July 9, 2014 at 10:34am

आदरणीय गुरुदेव श्री हृदयतल से हार्दिक आभार आपका आपके ही आशीष का फल है जो कुछ भी आज लिख पा रहा हूँ. आशीष एवं स्नेह यूँ ही बनाये रखिये

Comment by अरुन 'अनन्त' on July 9, 2014 at 10:32am

आदरणीय गोपाल सर बहुत बहुत शुक्रिया

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