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प्रोषितपतिका  मंदिर में स्थित देवता पर फूल चढाने वाली ही  थी कि उसका आठ वर्षीय बेटा दौड़ा हुआ आया और हांफते हुए बोला  -'मम्मी , पूरे दस महीने बाद आज डैडी घर आये है i'  इतना कह्कर लड़का वापस चला गया i माँ ने झटपट पूजा संपन्न की  और घर की ओर भागी i उसके पहुचते ही बेटे ने टिप्पड़ी की  माँ आपके दोनों पैरो में अलग - अलग किस्म की चप्पले है i  माँ ने झेप कर पैरो की ओर देखा फिर  लाज की एक रेखा सी उसके चेहरेपर दौड़ गयी i पतिदेव शरारत से मुस्कराये i

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 1, 2014 at 5:55pm

आदरणीय निकोर जी

आपका अनुमोदन सर आँखों पर  i

Comment by vijay nikore on July 1, 2014 at 3:43pm

आदरणीय गोपाल नारायन जी, आपकी लघुकथा पुनर्मिलन के भावनात्मक क्षण को अच्छा जी रही है। हार्दिक बधाई।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 1, 2014 at 11:16am

ब्रिजेश जी

आपका आभार i नया नया शौक है i आप सब से निरंतर सीखना है i  बस हौसला बढ़ाते रहे i

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 1, 2014 at 11:14am

महनीया

आपको अच्छी लगी तो लेखन सार्थक हुआ i

Comment by बृजेश नीरज on June 30, 2014 at 11:41pm
सुन्दर लघु कथा। आपको बधाई।
मेरे हिसाब से इस लघुकथा को आपने समय कम दिया है।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 30, 2014 at 9:18pm

एक बहुत ही भावनात्मक क्षण को जीती ये लघु कथा बहुत प्यारी लगी ,हार्दिक बधाई आपको आदरणीय 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 30, 2014 at 12:24pm

जीतू जी

आपका  हार्दिक आभार i 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 30, 2014 at 12:07pm

लडीवाला जी

आपका सादर आभार i

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on June 30, 2014 at 12:06pm

बहुत सुंदर लघुकथा आदरणीय डा गोपाल जी ,बिछुड़ों से मिलन हो तो फिर होश कहाँ , उस पर फिर शरारतें. आदरणीय डा गोपाल जी , हार्दिक बधाई आपको

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on June 30, 2014 at 11:40am

लाज और शरारत के भाव दर्शाती सुंदर लघु कथा के लिए बधाई डॉ गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी 

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