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हुई न खत्म मेरी दास्ताने ग़म यारो- ग़ज़ल

1212 1122 1212 22

हुई न खत्म मेरी दास्ताने ग़म यारो

हरेक लफ़्ज़ अभी अश्क़ से है नम यारो

 

है ज़िन्दगी तो यहाँ मुश्किलात भी होंगी

चलो जियें इसे हर सांस दम ब दम यारो

 

इधर चराग का जलना उधर हवा की रौ

ये मेरा ज़ोरे जिगर और वो सितम यारो

 

लिबास ही से न होगा कभी नुमायाँ सच

सफ़ेदपोश तो लगते हैं मुह्तरम यारो

 

रहा न बस कोई तहरीर पर किसी का अब

चलाना भूल गईं उँगलियाँ क़लम यारो

 

मैं रफ़्ता- रफ़्ता उबरने लगा हवादिस से

कि हौसला मेरे दिल में कहाँ है कम यारो

 

मुह्तरम =सम्माननीय

तहरीर =लिखावट

 

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by गिरिराज भंडारी on June 24, 2014 at 5:05pm

हरेक शे र में मुझको लगे है दम यारों

हरूफ अब मुझे लगने लगे हैं कम यारों

सच है भाई शिज्जू , बहुत लाजवाब गज़ल कही , सराहना के लिये शब्द नही मिल पाये । मेरी निगाह मे अब तक की पढी आपकी गज़लों में ऊपर के तीन मे ये ग़ज़ल लगी । दुआ करता हूँ , ईश्वर आपकी कही  ऐसी और ग़ज़लें पढवायें ॥ दिली बधाइयाँ ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on June 24, 2014 at 8:25am

आदरणीया कुन्ती जी आपका हार्दिक आभार


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on June 24, 2014 at 8:24am

आदरणीया राजेश दीदी आपका तहेदिल से शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on June 24, 2014 at 8:24am

आदरणीय अभिनव अरुण जी आपका हार्दिक आभार


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on June 24, 2014 at 8:23am

आदरणीय सुशील सर आपका बहुत बहुत शुक्रिया 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on June 24, 2014 at 8:22am

आदरणीय डॉ गोपाल नारायण सर लगातार तीसरी बार रचना आपकी सर्वप्रथम प्रतिक्रिया मेरा उत्साह बढ़ा है, रचना को समय देने के लिये एवं सराहना के लिये आपका बहुत बहुत शुक्रिया। स्नेह यूँ ही बनाये रखें।

सादर,

Comment by coontee mukerji on June 24, 2014 at 1:18am

मैं रफ़्ता- रफ़्ता उबरने लगा हवादिस से

कि हौसला मेरे दिल में कहाँ है कम यारो....बहुत खूब.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 23, 2014 at 9:04pm

इधर चराग का जलना उधर हवा की रौ

ये मेरा ज़ोरे जिगर और वो सितम यारो-----बेहद खूबसूरत अशआर 

 

मैं रफ़्ता- रफ़्ता उबरने लगा हवादिस से

कि हौसला मेरे दिल में कहाँ है कम यारो-----गजब के आत्मविश्वास से भरा 

बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है शिज्जू भाई ,दिली दाद कबूलें 

 

Comment by Abhinav Arun on June 23, 2014 at 7:17pm
वाह आदरणीय श्री शिज्जू जी सुन्दर प्रभावी भावपूर्ण ग़ज़ल ..
इधर चराग का जलना उधर हवा की रौ

ये मेरा ज़ोरे जिगर और वो सितम यारो
लाजवाब ..दिली मुबारकबाद इस ग़ज़ल के लिए !!
Comment by Sushil Sarna on June 23, 2014 at 12:21pm

हुई न खत्म मेरी दास्ताने ग़म यारो
हरेक लफ़्ज़ अभी अश्क़ से है नम यारो

है ज़िन्दगी तो यहाँ मुश्किलात भी होंगी
चलो जियें इसे हर सांस दम ब दम यारो ........वाआआआआआआअह बेहद खूबसूरत अल्फ़ाज़ों से सजी इस ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय शिज्जु शकूर जी

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