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आपगा सरस्वती

मंत्र है प्रमाण इस भारत मही में कभी

 वाणी की प्रतीक देवि आपगा यशस्विनी  I

बहती थी मंद -मंद  सींचती थी छंद -छंद

बोलती थी कल , कल -कंठ से मनस्विनी  I

स्नान करते थे आर्य, पान करते थे वारि

ध्यान  धरती  थी  यह धारिणी तपस्विनी I

आज यदि होती वह , मेरे पाप धोती वह

  ज्ञान  बीज  बोती,   मेरी  मातः पयस्विनी  I

 

 

(मौलिक और अप्रकाशित )

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 23, 2014 at 7:10pm

विजय मिश्रा जी

आपका शत -शत आभार i

Comment by विजय मिश्र on June 23, 2014 at 12:36pm
मनोहारी वर्णन ,जय मातु सरस्वती ,हें ज्ञानदा भगवती !साधुवाद गोपाल नारायनजी
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 23, 2014 at 11:15am

आदरणीय  विजय शंकर जी

 

 

 

 

 

 

 

 आपसे ऐसा ही स्नेह अपेक्षित है i सादर i

 

 

 

 

 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 23, 2014 at 11:11am

आदरणीया  विन्दु बाबु

आपके प्रति शत -शत आभार i

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 23, 2014 at 11:09am

प्रिय जवाहरलाल जी

शारदा माँ पर आपका अनुराग अक्षुण्ण बना रहे i सादर i

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 23, 2014 at 11:06am

आदरणीय मित्र भंडारी जी

आपके प्यार का आभार i

Comment by Dr. Vijai Shanker on June 23, 2014 at 9:58am
स्तुत्य एवं वंदनीय ।
Comment by Vindu Babu on June 23, 2014 at 9:34am

महोदय, 

इस सुंदर वन्दना के लिए हार्दिक बधाई आपको।

माँ सरस्वती की कृपा आप पर सदैव बनी रहे...मेरी शुभकामनायें।

सादर

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on June 22, 2014 at 9:33pm

जय माँ वीणापाणी! जय माँ शारदे!  


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 22, 2014 at 8:28pm

आदरणीय बड़े भाई गोपाल जी , माँ सरस्वती की सुन्दर वंदना  की रचना के लिये आपको हार्दिक बधाइयाँ । माँ सरस्वती की  कृपा ऐसे ही आप पर बनी रहे !

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