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तुम हर पल जीतना चाहते हो
हारना तुम्हारी फितरत में नहीं है
कोई तुम्हारी युद्ध से
लौटी तलवार को
छूना नहीं चाहता
तुम्हारे रक्त-रंजित  हाथ
अब तुम्हारी माँ भी
नहीं पहचानती.
तुम्हारे बाल सखा कबके
विलीन हो गए रणभूमि में
तुम्हारी जीत के लिए.
कोई तुम्हारे कमजोर
पलों में
साथ नहीं देना चाहता
इतनी जीत का क्या करोगे?

डॉ. विजय प्रकाश शर्मा

(मौलिक व अप्रकाशित )
 

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Comment

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Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on June 19, 2014 at 1:58pm

आ० विजय निकोर जी,सराहना के लिए बहुत- बहुत आभार.

Comment by vijay nikore on June 19, 2014 at 1:25pm

आपने चिंतन के लिए अच्छे विचार दिए हैं। इस अच्छी रचना के लिए बधाई।

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on June 18, 2014 at 9:34am

आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी , नमस्कार -
आपकी प्रतिक्रिया का हार्दिक आभार।
स्नेह बनाये रखें .


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 18, 2014 at 2:22am

वाह ! भौतिक सुखों का चरम किसी प्रासंगिक और संलिप्त जीवन को कितना एकाकी कर देता है.

जबर्दस्त विश्वास के साथ प्रवाह में कही गयी इस सचेत करती रचना के लिए हृदय से धन्यवाद आदरणीय

सादर

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on June 13, 2014 at 12:49am

आपका बहुत- बहुत आभार मीना जी.

Comment by Meena Pathak on June 12, 2014 at 9:49pm

बहुत सुन्दर .. बधाई स्वीकारें आदरणीय विजय जी 

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on June 12, 2014 at 8:11pm

आभार अन्नपूर्णा जी.

Comment by annapurna bajpai on June 12, 2014 at 8:00pm

सुंदर रचना बधाई आपको आ0 विजय प्रकाश जी । 

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on June 12, 2014 at 7:22pm

आभार गिरिराज भाई.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 12, 2014 at 5:54pm

जब जीत की खुशी बाँटने वाला ही नही बचा है , तो ऐसी जीत बेमानी ही है । सुन्दर विचार ॥ बधाई ॥

कृपया ध्यान दे...

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