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हे मन कर कल्पना....

हे मन कर कल्पना

बना फिर अल्पना

खोल कर द्वार

सोच के कर पुनः संरचना

हे मन कर कल्पना

 

क्यूँ मौन तू हो गया

किस भय से तू डर गया

खड़ा हो चल कदम बढ़ा

करनी है तुझे कर्म अर्चना   

हे मन कर कल्पना

 

छोड़ उसे जो बीत गया

भूल उसे जो रीत गया

निश्चय कर दम भर ज़रा

सुना समय को अपनी गर्जना

हे मन कर कल्पना

 

पथ है खुला तू देख तो

नैनो को मीच खोल तो 

ऊंचाई पर ही फल मीठा मिले

बिन गाये नहीं होती वन्दना

हे मन कर कल्पना

 

किनारे छोड़ नदी में उतर

तैर कर असत्य पार आ

बिन मरे न कोई स्वर्ग पाये

गढ़नी है तुझे नयी अभिव्यंजना

हे मन कर कल्पना……

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

प्रियंका.....

Views: 664

Comment

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Comment by vijay nikore on May 26, 2014 at 3:32pm

//क्यूँ मौन तू हो गया

किस भय से तू डर गया

खड़ा हो चल कदम बढ़ा

करनी है तुझे कर्म अर्चना   

हे मन कर कल्पना//

//छोड़ उसे जो बीत गया

भूल उसे जो रीत गया

निश्चय कर दम भर ज़रा

सुना समय को अपनी गर्जना

हे मन कर कल्पना//

यूँ तो सारी कविता ही प्रोत्साहित कर रही है, परन्तु यह पंक्तियाँ अत्यन्त मनमोहक लगीं।

 

किसी भी आशाहीन को आशापूर्ण करती इस सुन्दर प्रस्तुति के लिए साधुवाद, आदरणीया प्रियंका जी।

 

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on May 26, 2014 at 3:02pm

पथ है खुला तू देख तो

नैनो को मीच खोल तो 

ऊंचाई पर ही फल मीठा मिले

बिन गाये नहीं होती वन्दना

हे मन कर

सुन्दर सन्देश और जोश बढाती अच्छी रचना
भ्रमर ५

कल्पना

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on May 23, 2014 at 12:56pm

गढ़नी  है तुझे नयी अभिव्यंजना

रे मन कर कल्पना ---

यही तो कवि धर्म है i ऐसी समुन्नत विचार को आशीष  i

Comment by Shyam Narain Verma on May 23, 2014 at 9:49am
इस सुन्दर प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई...............

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on May 23, 2014 at 8:08am

बहुत बढ़िया आदरणीया प्रियंका जी

Comment by Meena Pathak on May 22, 2014 at 11:35pm

बहुत सुन्दर ... बधाई आदरणीया 

कृपया ध्यान दे...

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