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धरती की गुहार अम्बर से !!

प्यासी धरती आस लगाये देख रही अम्बर को |
दहक रही हूँ सूर्य ताप से शीतल कर दो मुझको ||

पात-पात सब सूख गये हैं, सूख गया है सब जलकल  
मेरी गोदी जो खेल रहे थे नदियाँ जलाशय, पेड़ पल्लव
पशु पक्षी सब भूखे प्यासे हो गये हैं जर्जर
भटक रहे दर-दर वो, दूँ मै दोष बताओ किसको
प्यासी धरती आस लगाए देख रही अम्बर को |

इक की गलती भुगत रहे हैं, बाकी सब बे-कल बे-हाल
इक-इक कर सब वृक्ष काट कर बना लिया महल अपना
छेद-छेद कर मेरा सीना बहा रहे हैं निर्मल जल
आहत हो कर इस पीड़ा से देख रही हूँ तुम को

प्यासी धरती आस लगाए देख रही अम्बर को |

सुन कर मेरी विनती अब तो, नेह अपना छलकाओ तुम
गोद में मेरी बिलख रहे जो उनकी प्यास बुझाओ तुम
संतति कई होते इक माँ के पर माँ तो इक होती है
एक करे गलती तो क्या देती है सजा सबको ?
प्यासी धरती आस लगाए देख रही अम्बर को |

जो निरीह,आश्रित हैं जो, रहते हैं मुझ पर निर्भर
मेरा आँचल हरा भरा हो तब ही भरता उनका उदर
तुम तो हो प्रियतम मेरे, तकती रहती हूँ हर पल
अब जिद्द छोड़ो इक की खातिर दण्ड न दो सबको  
प्यासी धरती आस लगाए देख रही अम्बर को |

झड़ी लगा कर वर्षा की सिंचित कर दो मेरा दामन
प्रेम की बूंदों से छू कर हर्षित कर दो मेरा तनमन
चहके पंक्षी, मचले नदियाँ, ओढूं फिर से धानी चुनर 
बीत गए हैं बरस कई किये हुए आलिंगन तुमको
प्यासी धरती आस लगाए देख रही अम्बर को ||

मीना पाठक 
मौलिक/अप्रकाशित 

Views: 735

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Comment by Meena Pathak on May 27, 2014 at 3:59pm

आदरणीय सौरभ सर नमन 

हार्दिक  आभार स्वीकारें  | सादर 

Comment by Meena Pathak on May 27, 2014 at 3:57pm

आदरणीय गिरिराज जी रचना पर उत्साहवर्धन हेतु सादर आभार स्वीकारें 

Comment by Meena Pathak on May 27, 2014 at 3:56pm

प्रिय जीतेन्द्र बहुत बहुत आभार | सस्नेह 

Comment by Meena Pathak on May 27, 2014 at 3:54pm

आदरणीय आशुतोष मिश्रा जी रचना सराहने हेतु सादर आभार स्वीकारें 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 23, 2014 at 11:47pm

बहुत संयत प्रयास हुआ है. 

इस रचना के लिए बारम्बार बधाइयाँ और हार्दिक शभकामनाएँ, आदरणीया

 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 23, 2014 at 9:35pm

आदरणीया मीना जी , प्रकृति की बिग़ड्ती स्थिति के लिये जागृत करती आपकी रचना के लिये आपको बधाइयाँ ।

Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 23, 2014 at 5:21pm

आदरणीया मीना जी ..चेतावनी देती रचना , आदमी वक़्त रहते न समझा तो बहुत बुरा होगा ..बहुत ही बढ़िया रचना मेरी तरफ से सादर बधाई 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on May 22, 2014 at 9:48am

बहुत ही सुंदर भाव, सच! इस भीषण ज्वाला को धरा ही सहन कर सकती है. बहुत बहुत बधाई आपको आदरणीया मीना दीदी

Comment by Meena Pathak on May 21, 2014 at 11:41am

आदरणीय अरुन जी , बहुत बहुत आभार | सादर 

Comment by Meena Pathak on May 21, 2014 at 11:41am

सादर आभार आदरणीय शिज्जू जी 

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