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नन्हीं सी चिनगारी

निष्प्राण कभी लगता
जीवन
निर्मम समय-प्रहारों से
सूख-बिखरते,बू खोते
सुरभित पुष्प अतीत के.

निश्चेत 'आज' भी होता
भावी शीतल-शुष्क
हवाओं की आहट पाने को.

फिर भी कुछ अंश
जिजीविषा के रहते
गतिमान रखें जो तन को
निरा यंत्र-सा.

जो हेतु बने
दाव,हवन,होलिका के
या अस्तित्व मिटाती
झंझावर्तों में

चिनगारी...
वही एक नन्हीं सी.

द्युतिमान रहूँ मैं भी
हों तूफान,थपेड़े
या ग्रहण छाएं
अस्तित्व पर
तुम्हारी तरह
अंतिम श्वास तक.

-विन्दु
मौलिक/अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Vindu Babu on May 17, 2014 at 2:04pm

आदरणीय शिज्जू जी:

आपने रचना का मर्म समझा,उसकी तह तक गये इसके लिए आपका हार्दिक आभार।

सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 14, 2014 at 5:05pm

एकाकीपन जीवन में अन्यमनस्क क्षणों को बो देता है, जिनके बिरवे फूल खिलायें न खिलायें मन-धरा पर झंखार अवश्य बोझ देते हैं. इन विन्दुओं को स्वर देती आपकी कविता इनसे उबरने का संकेत भी देती है लेकिन वे संकेत अत्यंत फ़ीबल हैं.
एक वैचारिक कविता के लिए हार्दिक बधाई.

टंकण दोष मुझे व्यक्तिगत तौर पर वाचन के क्रम में थोड़े कर्कश लगे. उनके प्रति एक रचनाकार के तौर पर संवेदना बनी रहनी चाहिये ऐसा मेरा मानना है. यह कोई सुझाव नहीं मेरे अपने अपुष्ट विचार मात्र हैं.
रचना की पंक्तियों से गुजरना वाकई भला लगा, पुनः हार्दिक बधाइयाँ.
 

Comment by Meena Pathak on May 13, 2014 at 10:41am

बहुत सुन्दर .... हार्दिक बधाई बाबू | सस्नेह 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on May 13, 2014 at 7:29am

संवेदनाओं को बहुत सुन्दरता से प्रवाह देती इस रचना पर हार्दिक बधाई स्वीकारें आदरणीया विन्दु जी

Comment by MAHIMA SHREE on May 10, 2014 at 1:17pm

बहुत ही उत्तम रचना ..  बहुत -२ बधाई आपको आ. वंदना जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on May 10, 2014 at 8:21am

//निष्प्राण कभी लगता
जीवन
निर्मम समय-प्रहारों से
सूख-बिखरते,बू खोते
सुरभित पुष्प अतीत के.//  आदरणीया वंदना जी निराशा से शुरू हुई कविता

// द्युतिमान रहूँ मैं भी
हों तूफान,थपेड़े
या ग्रहण छाएं
अस्तित्व पर
तुम्हारी तरह
अंतिम श्वास तक.//  एक हौसले और उम्मीद पर जाके रुकती है

शब्दों के साथ भावों का प्रवाह नदी के प्रवाह में डोलती मगर अपने गंतव्य की तरफ दृढ़ता से बढ़ती नौका की तरह प्रवाहमान है बहुत बहुत बधाई आपको इस रचना के लिये

Comment by Vindu Babu on May 10, 2014 at 5:31am

आपसे तो समालोचनात्मक टिप्पणी की सादर अपेक्षा रखती हूँ आदरणीय ब्रिजेश सर जी।

जिससे कुछ कमियां और सुधार मालूम हो सके।

खैर...

आपका हार्दिक आभार रचना की सराहना के लिए।

सादर

Comment by Vindu Babu on May 10, 2014 at 5:27am

आदरणीया महेश्वरी दी..

आपका बहुत शुक्रिया।

Comment by बृजेश नीरज on May 6, 2014 at 8:55am

वाह! बहुत सुन्दर कविता! आपको हार्दिक बधाई!

Comment by Maheshwari Kaneri on May 5, 2014 at 6:39pm

बहुत सुंदर प्रभावी कविता विन्दु जी

कृपया ध्यान दे...

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