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ग़ज़ल : तभी जाके ग़ज़ल पर ये गुलाबी रंग आया है

बह्र : १२२२ १२२२ १२२२ १२२२

महीनों तक तुम्हारे प्यार में इसको पकाया है

तभी जाके ग़ज़ल पर ये गुलाबी रंग आया है

अकेला देख जब जब सर्द रातों ने सताया है

तुम्हारा प्यार ही मैंने सदा ओढ़ा बिछाया है

किसी को साथ रखने भर से वो अपना नहीं होता

जो मेरे दिल में रहता है हमेशा, वो पराया है

तेरी नज़रों से मैं कुछ भी छुपा सकता नहीं हमदम

बदन से रूह तक तेरे लिए सबकुछ नुमाया है

कई दिन से उजाला रात भर सोने न देता था

बहुत मजबूर होकर दीप यादों का बुझाया है

-------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 1, 2014 at 10:03am

बहुत बहुत शुक्रिया प्राची जी


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on April 28, 2014 at 8:37pm

किसी को साथ रखने भर से वो अपना नहीं होता

जो मेरे दिल में रहता है हमेशा, वो पराया है.......................बहुत खूब 

कई दिन से उजाला रात भर सोने न देता था

बहुत मजबूर होकर दीप यादों का बुझाया है........................ये भी सुन्दर 

इस सुन्दर ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई 

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 21, 2014 at 3:22pm

बहुत बहुत धन्यवाद अरुन शर्मा 'अनन्त' जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 21, 2014 at 3:20pm

बहुत बहुत शुक्रिया ram shiromani pathak जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 21, 2014 at 3:20pm

बहुत बहुत धन्यवाद rajesh kumari जी। त्रुटि की तरफ ध्यान दिलाने के लिए शुक्रिया।

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 21, 2014 at 3:19pm

बहुत बहुत धन्यवाद Baidyanath Saarthi जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 21, 2014 at 3:19pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय vijay nikore जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 21, 2014 at 3:18pm

बहुत बहुत धन्यवाद vandana जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 21, 2014 at 3:17pm

बहुत बहुत धन्यवाद umesh katara साहब

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 21, 2014 at 3:17pm

बहुत बहुत शुक्रिया gumnaam pithoragarhi साहब

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