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         चुनाव

भरे नहीं थे पिछले घाव

लो फिर आगया चुनाव

मुद्दों की मलहम लेकर

घर-घर बाँट रहे हैं

फिर नए साजिश की

क्या ये सोच रहे हैं ?

धर्म मज़हब की लेकर आड़

करते नित नए खिलवाड़

फिर शह-मात की बारी है

सियासी जंग की तैयारी है

आरोप प्रत्यारोप का

भयंकर गोला बारी है

विकास की उम्मीद लिए

परिवर्तन पर परिवर्तन

लेकिन थमता नहीं यहाँ

कुशासन का ये नर्तन

कहीं मुँह बड़ा हुआ यहाँ

कहीं हो रही रोटी छोटी

ऐसे राजा का क्या  ?

जो कर दे देश की

किस्मत खोटी

************

महेश्वरी कनेरी

   मौलिक  /अप्रकाशित 

Views: 514

Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on April 30, 2014 at 4:57pm

चुनावी समय की यथा तस्वीर प्रस्तुत की ही आ० महेश्वरी कनेरी जी 

बधाई 

Comment by अरुन 'अनन्त' on April 21, 2014 at 1:12pm

आदरणीया बहुत ही सच बयानी की है आपने वास्तव में कुछ ऐसा ही हो रहा बहुत ही सुन्दर रचना बधाई स्वीकारें.

Comment by Maheshwari Kaneri on April 21, 2014 at 9:01am

उत्साह वर्धन के लिए आप का बहुत बहुत आभार आदरनीय शिज्जु  जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 20, 2014 at 8:54pm

आदरणीया महेश्वरी जी बेहतरीन भावाभिव्यक्ति है बहुत बहुत बधाई आपको

Comment by Maheshwari Kaneri on April 20, 2014 at 7:47pm

जितेन्द्र जी आप का बहुत बहुत आभार..

Comment by Maheshwari Kaneri on April 20, 2014 at 7:47pm

उत्साह वर्धन के लिए आप का बहुत बहुत आभार,गिरिराज जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 19, 2014 at 1:56pm

आज के चुनाही माहौल की सच्चाई को पूर्णतया बयान करती आपकी रचना के लिये आपको हार्दिक बधाई , आदरणीया महेश्वरी जी !

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 19, 2014 at 11:01am

न जाने कब तक जनता के खून-पसीने की कमाई से ऐसे पाखंडियों का चुनावी उत्सव चलता रहेगा. अपनी रचना में आपने बहुत सुंदर  चित्रण किया है आदरणीया माहेश्वरी जी, हार्दिक बधाई स्वीकारें

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