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रात थी लेकिन अँधेरा उतना भी गहरा न था- ग़ज़ल

2122- 2122- 2122- 212

रात थी लेकिन अँधेरा उतना भी गहरा न था

सब दिखाई दे गया आँखो में जो पर्दा न था

 

झूठ की बुनियाद पर कोई महल बनता नहीं

झूठ आखिर झूठ है उसको तो सच होना न था

 

शोर था सारे जहाँ में इक लहर की बात थी

कोई दा'वा उस लहर का अस्ल में सच्चा न था

 

कहने को तो साथ मेरे कारवाँ था लोग थे

मैं वही था हाँ मगर वो दौर पहले सा न था

 

ये सफर गुज़रा बड़े आराम से तो अब तलक

आखिरश रुकना पड़ा मुझको कि अब रस्ता न था

 

आप अपनी हैसियत को लें समझ अब मोहतरम

वो सिकंदर भी झुका था जो कभी हारा न था

 

उँगलियाँ थी नाम थे पहचान थी सबकी मगर

वे सभी बस वोट थे उनका कोई चेहरा न था   

 

 मौलिक व अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 4, 2014 at 9:56pm

आदरणीया कल्पना जी आपका हार्दिक आभार


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 4, 2014 at 9:55pm

आदरणीय गुमनाम भाई आपका बहुत बहुत शुक्रिया

Comment by कल्पना रामानी on April 3, 2014 at 10:13pm

बेहतरीन गजल के लिए आपको हार्दिक बधाई आदरणीय शिज्जु जी

उँगलियाँ थी नाम थे पहचान थी सबकी मगर

वे सभी बस वोट थे उनका कोई चेहरा न था....इस शानदार शेर के लिए बार-बार वाह !!!!!!!

Comment by gumnaam pithoragarhi on April 3, 2014 at 9:40pm

आप अपनी हैसियत को लें समझ अब मोहतरम

वो सिकंदर भी झुका था जो कभी हारा न था

उँगलियाँ थी नाम थे पहचान थी सबकी मगर

वे सभी बस वोट थे उनका कोई चेहरा न था   

बहुत खूब सर    सुन्दर गजल।  .............................................................

 

 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 3, 2014 at 6:29pm

आदरणीय लक्ष्मण जी आपका हार्दिक आभार


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 3, 2014 at 6:29pm

आदरणीया कुन्ती जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 3, 2014 at 6:28pm

आदरणीय गिरिराज सर आपका बहुत बहुत शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 3, 2014 at 6:27pm

आदरणीय श्यामनारायण सर आपका बहुत बहुत शुक्रिया

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 3, 2014 at 6:26pm

आदरणीय शिज्जू भाई ,बेहतरीन ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 3, 2014 at 5:44pm

आदरणीय शिज्जू भाई , वर्तमान परिदृश्य पर बहुत सार्थक और बहुत दमदार ग़ज़ल कही है ॥ एक- एक शे र के लिये अलग अलग ढेरो ढेरों हार्दिक बधाइयाँ ॥

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