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ग़ज़ल : पत्थरों में खौफ़ का मंज़र भरे बैठे हैं हम

एक ताज़ा ग़ज़ल आपकी मुहब्बतों के हवाले ....


पत्थरों में खौफ़ का मंज़र भरे बैठे हैं हम |

आईना हैं, खुद में अब पत्थर भरे बैठे हैं हम |

 

हम अकेले ही सफ़र में चल पड़ें तो फ़िक्र क्या,
अपनी नज़रों में कई लश्कर भेरे बैठे हैं हम |

जौहरी होने की ख़ुशफ़हमी का ये अंजाम है,
अपनी मुट्ठी में फ़कत पत्थर भरे बैठे हैं हम |

 

लाडला तो चाहता है जेब में टॉफी मिले,
अपनी सारी जेबों में दफ़्तर भरे बैठे हैं हम |

हमने अपनी शख्सियत बाहर से चमकाई मगर,
इक अँधेरा आज भी अन्दर भरे बैठे हैं हम |

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by Madan Mohan saxena on December 3, 2014 at 3:20pm

जौहरी होने की ख़ुशफ़हमी का ये अंजाम है,
अपनी मुट्ठी में फ़कत पत्थर भरे बैठे हैं हम |

लाडला तो चाहता है जेब में टॉफी मिले,
अपनी सारी जेबों में दफ़्तर भरे बैठे हैं हम |
बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी बेह्तरीन अभिव्यक्ति !शुभकामनायें.

Comment by Sushil Sarna on April 25, 2014 at 4:04pm

लाज़वाब और दिलकश ग़ज़ल जिसका हर शेर एक अलग महक से लबरेज़ है  .... हार्दिक बधाई कबूल फरमाएं सर  … सर क्षमा करें इस लाईन में ''अपनी नज़रों में कई लश्कर भेरे बैठे हैं हम'' भेरे के स्थान पर भरे होना चाहिए शायद ये टंकण त्रुटि है … शेष इस दिलकश सृजन के लिए हार्दिक बधाई  आदरणीय वीनस जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on April 3, 2014 at 9:38am

हर एक शेर दिल के करीब लगा 

बहुत बहुत बधाई आ० वीनस जी 

Comment by vandana on March 28, 2014 at 4:33am

जौहरी होने की ख़ुशफ़हमी का ये अंजाम है, 
अपनी मुट्ठी में फ़कत पत्थर भरे बैठे हैं हम |

 

लाडला तो चाहता है जेब में टॉफी मिले, 
अपनी सारी जेबों में दफ़्तर भरे बैठे हैं हम |

कमाल की ग़ज़ल है आदरणीय वीनस सर 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 28, 2014 at 3:29am

हर शेर के लिए अलग-अलग दाद कुबूल करें, वीनस भाई.

कहते हैं न, भाव प्रस्तुति सफल वो जो पाठक की अनुभूति का हिस्सा बन जाये. इस हिसाब से ग़ज़ल सफल है, 

शुभ-शुभ

Comment by Sarita Bhatia on March 26, 2014 at 10:41am

आदरणीय वीनस जी ढेरों बधाइयाँ इस लाजवाब गजल के लिए क्या गहरी बात की है 

जौहरी होने की ख़ुशफ़हमी का ये अंजाम है,

अपनी मुट्ठी में फ़कत पत्थर भरे बैठे हैं हम |

 

हमने अपनी शख्सियत बाहर से चमकाई मगर,

इक अँधेरा आज भी अन्दर भरे बैठे हैं हम |

वाह क्या बात 

Comment by भुवन निस्तेज on March 25, 2014 at 11:48pm

लाडला तो चाहता है जेब में टॉफी मिले, 
अपनी सारी जेबों में दफ़्तर भरे हैं हम |

आदरणीय वीनस केशरी जी, क्या बात कह दी आपने...

हम जेबों में टाफियां न भरकर दफ्तर भरे बैठे हैं, और खुद दफ्तर की जेबों में भी ठुंसे पड़े है...

आपको बधाइयाँ...

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on March 25, 2014 at 10:37pm

जौहरी होने की ख़ुशफ़हमी का ये अंजाम है,
अपनी मुट्ठी में फ़कत पत्थर भरे बैठे हैं हम............वाह ! लाजवाब  शेर

बेहतरीन गजल आदरणीय वीनस जी, दिली दाद कुबूल कीजिये

 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on March 25, 2014 at 5:26pm

जौहरी होने की ख़ुशफ़हमी का ये अंजाम है,
अपनी मुट्ठी में फ़कत पत्थर भरे बैठे हैं हम |
हमने अपनी शख्सियत बाहर से चमकाई मगर,
इक अँधेरा आज भी अन्दर भरे बैठे हैं हम |..आदरणीय वीनस जी ..बहुत दिनों बाद आज आपकी रचना को पढने का मौका मिला ..हमेशा की तरह आज भी बहुत कुछ सीखने को मिला ..आपको सादर बधाई के साथ

Comment by Abhinav Arun on March 25, 2014 at 2:29pm

जौहरी होने की ख़ुशफ़हमी का ये अंजाम है,
अपनी मुट्ठी में फ़कत पत्थर भरे बैठे हैं हम |
…… लाजवाब बेहतरीन सशक्त ग़ज़ल। .......... हार्दिक बधाई आदरणीय !!

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