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वो होगा जो कभी न हुआ, देखते रहो 
इक दिन खुलेगा बाबे वफा, देखते रहो ...
जो शख्स मुझ से रूठ गया है वो दोस्तो
आएगा मुसकुराता हुआ, देखते रहो....
ज़िंदाने ग़म में जिसने मुझे कैद कर दिया 
वो ही करेगा मुझ को रिहा , देखते रहो...
अशकों से कैसे बनते हैं मेरी ग़ज़ल के शेर 
लिक्खेगी मेरी नोके मिज़ा देखते रहो ...
फूलों में कौन भरता है ये रंगो बू अजय 
इंसान है कोई या खुदा , देखते रहो....

मौलिक व अप्रकाशित .....

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Comment

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Comment by Ajay Agyat on April 9, 2014 at 7:21pm

मफऊल  फायलात मफाईल फायलुन ... इस ग़ज़ल की बह्र है ..... या 221, 2121, 1221, 212/ 122 भी कह सकते हैं 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 23, 2014 at 4:04pm

आदरणीय अजयजी, बधाई.

कृपया, आदरणीय गिरिराजजी के कहे पर ध्यान दें.

सादर

Comment by Saarthi Baidyanath on March 4, 2014 at 8:48am

एक बढ़िया व अच्छे अशआर से सजी ग़ज़ल ..! बधाई जी !


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 3, 2014 at 7:38pm

आदरणीय अजय भाई , बहुत खूबसूरत गज़ल कही है , हर शे र उम्दा हुये हैं । आपको बहुत बधाइयाँ ॥ आदरणीय बह्र लिख देते को और भी अच्छा होता ॥

Comment by अनिल कुमार 'अलीन' on March 2, 2014 at 8:53pm

वाह-वाह..बहुत खूब जनाब................सकारात्मकता को प्रबल करती रचना............

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 2, 2014 at 8:03pm

आदरणीय भाई अजय जी , बेहतरीन ग़ज़ल के लिए बधाई .

अशकों से कैसे बनते हैं मेरी ग़ज़ल के शेर 
लिक्खेगी मेरी नोके मिज़ा देखते रहो ..

इस शे'र के लिए पुनः बधाई

कृपया ध्यान दे...

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