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बहुत गुमसुम सी लगती है ( ग़ज़ल ) गिरिराज भन्डारी

1222  1222  1222   1222

बहुत गुमसुम सी लगती है

 

ज़बाँ खामोश रहती है, निगाहें कुछ नही कहतीं

अगर जज़्बा न हो दिल में, तो बाहें कुछ नही कहतीं

यहाँ के हादसों का सच, तुम्हें खुद जानना होगा

तुम्हें मालूम तो होगा, कि राहें कुछ नहीं कहतीं

बहुत नोची गयी है ये, बहुत तोड़ी गयी है पर

वो अब तक जी रही है क्यों, ये चाहें कुछ नहीं कहतीं

ये ख़ंज़र पीठ में है क्यों, रफ़ाक़त ये कहाँ की है

बहुत गुमसुम सी लगती है, कराहें कुछ नही कहतीं

ख़ुदा का नूर है सब में, करमफ़र्मा वही है पर

करम चुप चाप बहता है, पनाहें कुछ नहीं कहतीं

उधर कुछ भी असर होता दिखाई क्यों नहीं देता

इधर कितनी रसाई है, ये आहें कुछ नहीं कहतीं 

 

**********************

मौलिक एवँ अप्रकाशित 

Views: 940

Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 17, 2014 at 8:01am

आदरणीय नादिर खान भाई , गज़ल की सराहना के लिये आपका आभारी हूँ ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 17, 2014 at 8:00am

आदरणीय सौरभ भाई , प्रयास कर्म की सराहना के लिये आपका तहे दिल से शुक्रिया , जो कुछ भी मुझसे अच्छा हो पाता है उसमे आपकी और अन्य गुणी जनों की सीख शामिल है , आप सब का बहुत आभार ॥

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 17, 2014 at 7:36am

आदरणीय भाई गिरिराज जी, बेहद उम्दा गजल दो  शेर अत्यधिक  पसंद आये 

/ये ख़ंज़र पीठ में है क्यों, रफ़ाक़त ये कहाँ की है

बहुत गुमसुम सी लगती है, कराहें कुछ नही कहतीं

/

ख़ुदा का नूर है सब में, करमफ़र्मा वही है पर

करम चुप चाप बहता है, पनाहें कुछ नहीं कहतीं

Comment by vandana on January 17, 2014 at 6:57am

यहाँ के हादसों का सचतुम्हें खुद जानना होगा

तुम्हें मालूम तो होगाकि राहें कुछ नहीं कहतीं

ये ख़ंज़र पीठ में है क्योंरफ़ाक़त ये कहाँ की है

बहुत गुमसुम सी लगती हैकराहें कुछ नही कहतीं

बहुत बढ़िया ग़ज़ल आदरणीय सर 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on January 16, 2014 at 11:57pm

आदरणीय गिरिराज जी, बेहद उम्दा गजल यह शेर खास पसंद हुआ

ये ख़ंज़र पीठ में है क्यों, रफ़ाक़त ये कहाँ की है

बहुत गुमसुम सी लगती है, कराहें कुछ नही कहतीं

Comment by ajay sharma on January 16, 2014 at 11:43pm

ki sher pe kha kahe alfaz  hi doondh rahe hai ............wah wah sir ji...............sampurna gazal bar bar kai bar padi kintu man ab tak nahi bhara ................................dili mubaraqbaad ..shukriya ...aisi sharing ke liye ......... 

Comment by नादिर ख़ान on January 16, 2014 at 11:35pm

ज़बाँ खामोश रहती हैनिगाहें कुछ नही कहतीं

अगर जज़्बा न हो दिल मेंतो बाहें कुछ नही कहतीं

बहुत खूब कहा आदरणीय गिरिराज जी ।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 16, 2014 at 11:35pm

ख़ुदा का नूर है सब में, करमफ़र्मा वही है पर

करम चुप चाप बहता है, पनाहें कुछ नहीं कहतीं..

वाह !

प्रयासकर्म की सुन्दर प्रस्तुति हुई है आदरणीय


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 16, 2014 at 9:45pm

आदरणीया कुंती जी , गज़ल की सराहना कर उत्साह वर्धन करने के लिये आपका आभारी हूँ ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 16, 2014 at 9:42pm

आदरणीया अन्नपूर्णा जी , गज़ल की सराहना के लिये आपका हार्दिक आभार ॥

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