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स्कूल के कुछ दोस्त मिलकर घर में पड़े पुराने कम्बल गरीबों में बाँटने को निकले। कम्बल बाँट कर वे ज्यों ही वापस चलने को हुए, एक बुजुर्ग ने आवाज़ लगाई ………

"बबुआ जी तनिक सुनो"

"जी बाबा, आपको तो कम्बल दे दिया न ?"

"जी बबुआ जी, कम्बल तो दिया और फिर आप लोग ऐसे ही चल दिए"
"ऐसे ही चल दिए मतलब ?"

"बबुआ जी, पिछले तीन दिन से चमचमाती गाड़ियों में साहब लोग आते हैं, कम्बल बाँट कर फ़ोटो खिचवाते हैं और फिर २०-२० रूपया देकर कम्बल वापस ……… "

(मौलिक व अप्रकाशित)

पिछला पोस्ट =>कीमत

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Comment by coontee mukerji on December 24, 2013 at 10:23pm

.......क्या ऐसा भी होता है....वेरी बेड.

Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on December 24, 2013 at 10:23pm

सुन्दर रचना, सटीक प्रहार !
बधाई आदरणीय बागी जी !


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 24, 2013 at 6:33pm

बहुत बहुत आभार आदरणीया मीना पाठक जी । 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 24, 2013 at 6:32pm

ना ना आदरणीया, रेड बत्ती कार कह कर मैं दायरे को संकुचित करना नहीं चाहूँगा, आपको लघुकथा अच्छी लगी यह मेरे लिए उत्साह की बात है, बहुत बहुत आभार आदरणीया राजेश कुमारी जी ।


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 24, 2013 at 6:28pm

सराहना हेतु आभार आदरणीय श्याम नारायण वर्मा जी। 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 24, 2013 at 5:46pm

आदरणीय डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव, आपकी प्रतिक्रिया पढ़ने के बाद लघुकथा मुझे पहले से अच्छी लगने लगी, यह USP नहीं समझ सका आदरणीय, सराहना हेतु बहुत बहुत आभार आदरणीय ।

Comment by annapurna bajpai on December 24, 2013 at 5:36pm

आदरणीय बागी जी शीर्षक से न्याय करती एवं सच्चाई से रूबरू करवाती आपकी लघु कथा हेतु आपको बहुत बधाई । 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 24, 2013 at 5:33pm

आदरणीय अनुराग जी, प्रतिक्रिया हेतु बहुत बहुत आभार ।


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 24, 2013 at 5:31pm

आदरणीय शिज्जु शकूर जी,लघुकथा आपको पसंद आयी, लेखन कर्म सार्थक लगा,आभार आपका .

Comment by Tapan Dubey on December 24, 2013 at 4:50pm
आदरणीय गणेश जी आज का सच बयां करती ये लघुकथा। बधाई इस सुंदर रचना के लिए

कृपया ध्यान दे...

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