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भोर को निशा बना दे, अंधकार ही घना दे।
हो सके तो श्वांस ना दे, आदमी को आदमी।

लोभ के गुणों को जापे, हर्ष के लिए विलापे।
स्वार्थ में कठोर शापे, आदमी को आदमी।

भाग में रहा बदा है, जोड़ता यदा कदा है।
बांटता चला  सदा है, आदमी को आदमी।

शर्म ही बचा सकेगा, धर्म ही उठा सकेगा।
कर्म ही बना सकेगा, आदमी को आदमी।

_____मौलिक/अप्रकाशित______

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 25, 2013 at 8:36pm

भाई संजय हबीबजी, आपकी इस घनाक्षरी के लिए बधाई और शुभकामनाएँ.
इसके प्रवाह पर तनिक और आग्रही होना बनता है.
वैसे कथ्य के हिसाब से आपकी रचनाओं पर कहने के लिए नहीं, बल्कि गुनने के लिए तत्त्व होते हैं.
शुभेच्छाएँ.

Comment by ram shiromani pathak on December 20, 2013 at 9:45am

सुन्दर  प्रवाह व सुन्दर घनाक्षरी आदरणीय मिश्रा जी। ....... हार्दिक बधाई आपको 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 20, 2013 at 7:40am

आदरणीय संजय भाई

संदेश परक घनाक्षरी हेतु हार्दिक बधाई


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 19, 2013 at 7:38pm

अदरणीय संजय भाई , लाजवाब छ्न्द रचना हुई है , मज़ा आ गया पढ़ के ।  आपको हार्दिक बधाइयाँ ॥

Comment by annapurna bajpai on December 19, 2013 at 1:53pm

सुंदर एवं संदेश परक घनाक्षरी हेतु हार्दिक बधाई स्वीकारे आ० संजय हबीब जी । 

Comment by Meena Pathak on December 19, 2013 at 1:50pm

बहोत सुन्दर .. बधाई आदरणीय संजय जी | सादर 

Comment by Shyam Narain Verma on December 19, 2013 at 1:28pm
बहुत ही सुन्दर ,  हार्दिक बधाई आपको …………..
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 19, 2013 at 12:14pm

आदरणीय  हबीब जी

आपकी घनाक्षरी की विशेषता यह है  कि आपने इसमें स्वर एवं व्यंजन मैत्री का कुशल निर्वाह किया है i

एतदर्थ आपको बधाई i  

Comment by AVINASH S BAGDE on December 19, 2013 at 10:21am

शर्म ही बचा सकेगा, धर्म ही उठा सकेगा। 
कर्म ही बना सकेगा, आदमी को आदमी।..aameen!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on December 18, 2013 at 10:13pm

शर्म ही बचा सकेगा, धर्म ही उठा सकेगा। 
कर्म ही बना सकेगा, आदमी को आदमी।-----बहुत सुन्दर सार्थक बात कही है ,शानदार घनाक्षरी हेतु हार्दिक बधाई आदरणीय संजय हबीब जी 

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