For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

समृद्ध अतीत के माथे पर
अक्सर खिंच जाती हैं लकीरें
चिंतित भविष्य की
फैसलों की फर्श पर
क्यूं अक्सर
बिखर जाते हैं
बदलाव के मोती
खुशियों के आंगन में
टंगे मुस्कुराते गुब्बारों
पर अक्सर कोई चलाता है
गमों की गोलियां
बेवक्त पर काम आने वाला वक्त
अक्सर बदल जाता है आदमी की तरह
जब मौज मौसम की लेने निकलें तो
थम जाती हैं सुहानी हवाएं अक्सर
समझ आती है जब तलक हमको
नासमझी के कई काम हो जाते हैं,
जब तलक ढूंढ़ पाता हूं
वहीं और तमाम खो जाते हैं
अक्सर हम ख्वाबों की मानिंद
जमीं की जद पार कर जाते हैं
ऐसा भी कभी होता है कि
गम जागते रहते हैं और
हम सो जाते हैं।। 
- मौलिक व अप्रकाशित

Views: 428

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 20, 2013 at 2:16am

आपकी प्रस्तुतियों पर पाठकों द्वारा मिली प्रशंसा के साथ-साथ आपको सार्थक सुझाव भी मिले हैं.  आप सुझावों को हृदयंगम कर आगे प्रयासरत हों. आपकी संप्रेषणीयता सार्थक और स्पष्ट होती जायेगी.

शुभ-शुभ

Comment by कल्पना रामानी on December 19, 2013 at 9:22pm

गहन चिंतन की सुंदर अभिव्यक्ति हुई है आपकी रचना में, आदरणीय अतुल जी हार्दिक बधाई  


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on December 18, 2013 at 4:06pm

खुशियाँ और गम ज़िंदगी में साथ साथ ही चलते हैं...इंसान दो छोरों के बीच अक्सर झूला करता है.. और ये परिवर्तन इतने अनायास होते हैं कि ट्रांजिशन मूमेन्ट्स पता ही नहीं चलते... इस भाव को बहुत सही अभिव्यक्ति मिली है..

फिर भी इस प्रस्तुति में स्पष्टता के लिए कई जगह अल्पविराम का प्रयोग किया जाना था....

समृद्ध अतीत के माथे पर
अक्सर खिंच जाती हैं लकीरें
चिंतित भविष्य की.......................यह तर्क कुछ समझ नहीं आया; वर्तमान के माथे पर तो लकीरें समझ आती हैं, लेकिन अतीत के पन्नों में इस समय लकीरें खिंचना  वो भी भविष्य को लेकर ..यह मुझे स्पष्ट नहीं हो रहा ..कैसे?
.
फैसलों की फर्श पर................फैसलों के फर्श पर (फैंसलों को स्त्रीलिंग संज्ञा नहीं मान सकते..यह पुल्लिंग बहुवचन संज्ञा है )
क्यूं अक्सर...........................क्यूं का सही प्रारूप 'क्यों' है 
बिखर जाते हैं
बदलाव के मोती

बेवक्त पर काम आने वाला वक्त.....................बेवक्त पर काम आने की जगह सिर्फ //बेवक्त काम आने वाला वक़्त //लिखें तो ?
अक्सर बदल जाता है आदमी की तरह

जब तलक ढूंढ़ पाता हूं
वहीं और तमाम खो जाते हैं..............यह पंक्ति भी कुछ और स्पष्टता चाहती है 

फिलहाल कुल मिला कर एक बहुत सुन्दर प्रयास हुआ है.. जिस हेतु बहुत बहुत शुभकामनाएं स्वीकार करें आ० अतुल कुशवाह जी.

Comment by atul kushwah on December 17, 2013 at 5:59pm

आदरणीय सुशील जी, डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी, मीना जी, गिरिराज जी और भाई राजेश जी... .... आपका सबका आशीर्वाद बना रहे यही कामना है।.... आप सबका स्‍नेह अमूल्‍य और अप्रतिम है। सादर अतुल

Comment by राजेश 'मृदु' on December 17, 2013 at 4:53pm

बहुत बढि़या, बहुत ही बढि़या, आदरणीय अतुल जी, आपका रचनाकर्म स्‍वस्तिकारी है, साथ चलते रहें, सादर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 17, 2013 at 3:50pm

आदरणीय , सुन्दर रचना के लिये आपको बधाई ॥

Comment by Meena Pathak on December 17, 2013 at 3:08pm

बहुत सुन्दर रचना .. बधाई आप को 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 17, 2013 at 2:53pm

कुशवाह जी

अक्सर ऐसा ही होता है  i न जाने क्यों ?

 

न जाने तड़प तड़ित  से कौन  ?

निमंत्रण  देता  मुझको  मौन i ----------------- बधाई स्वीकार करे i

Comment by Sushil Sarna on December 17, 2013 at 1:44pm

sundr bhavabhivyakti

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसफ़िर' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला आपकी…"
6 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। भाई रवि जी की सलाह से यह और निखर गयी है । हार्दिक…"
10 hours ago
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
19 hours ago
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212  22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत में क्या से क्या हो गए महब्बत में मैं…"
22 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ
"  आपका हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’ जी   "
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा एकादश. . . . . पतंग
"आदरणीय सुशील सरनाजी, पतंग को लगायत दोहावलि के लिए हार्दिक बधाई  सुघड़ हाथ में डोर तो,…"
yesterday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय रवि भसीन 'शहीद' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला ग़ज़ल तक आए और हौसला…"
yesterday
Sushil Sarna posted blog posts
yesterday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय Jaihind Raipuri जी,  अच्छी ग़ज़ल हुई। बधाई स्वीकार करें। /आयी तन्हाई शब ए…"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on रामबली गुप्ता's blog post कर्मवीर
"कर्मवीरों के ऊपर आपकी छांदसिक अभिव्यक्ति का स्वागत है, आदरणीय रामबली गुप्त जी.  मनहरण…"
Tuesday
Jaihind Raipuri posted a blog post

ग़ज़ल

2122    1212    22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत मेंक्या से क्या हो गए महब्बत में मैं ख़यालों में आ गया उस…See More
Tuesday
Jaihind Raipuri commented on Admin's group आंचलिक साहित्य
"कुंडलिया छत्तीसगढ़ी छत्तीसगढ़ी ह भाखा, सरल ऐकर बिधान सहजता से बोल सके, लइका अऊ सियान लइका अऊ…"
Tuesday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service