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फिर मिलेगा हमें वो मान भी क्या(ग़ज़ल)

2122 -1212- 112

कट ही जाये अगर ज़बान भी क्या

फिर मिलेगा हमें वो मान भी क्या

 

आदमीयत के मोल जो मिली हो

दोस्तो ऐसी कोई शान भी क्या

 

मेरे पैरों में आज पंख लगे

अब ज़मीं क्या ये आसमान भी क्या

 

छोड दें गर ज़मीन अपने लिये

ऐसे सपनों की फिर उड़ान भी क्या

 

और के काम आ सके न कभी

ऐसा इंसान का है ज्ञान भी क्या

 

भाग के गर मुसीबतों से कहीं

बच ही जाये तो ऐसी जान भी क्या

 

एक चिंगारी से लगी थी आग

अब बचेगा मेरा मकान भी क्या

 

-मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by शिज्जु "शकूर" on December 18, 2013 at 10:51am

आदरणीय अभिनव जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया


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Comment by शिज्जु "शकूर" on December 18, 2013 at 10:51am

आदरणीया अन्नपूर्णा जी आपका आभार 


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Comment by शिज्जु "शकूर" on December 18, 2013 at 10:51am

आदरणीय उमेश जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया

Comment by Abhinav Arun on December 18, 2013 at 10:31am

क्या कहने आ. शिज्जू जी क्या दार्शनिक अंदाज़ में फलसफे वाली ग़ज़ल कही है हार्दिक बधाई दिल खुश हुआ , बहुत शुभकामनायें !!

Comment by annapurna bajpai on December 17, 2013 at 10:57pm

आ0 शिजू जी सुंदर गजल के लिए बधाई स्वीकारें । 

Comment by umesh katara on December 17, 2013 at 11:04am

वाह वाह सर खूब गज़ल हुयी है वाह
आदमीयत के मोल जो मिली हो
दोस्तो एसी कोई शान भी क्या
वाहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहह


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 17, 2013 at 10:03am

आदरणीय वीनसजी हौसलाअफ़्ज़ाई के लिये आपका बहुत बहुत शुक्रिया


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Comment by शिज्जु "शकूर" on December 17, 2013 at 10:01am

आदरणीया कल्पना जी आपका आभार


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Comment by शिज्जु "शकूर" on December 17, 2013 at 10:01am

भाई रामशिरोमणि जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया


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Comment by शिज्जु "शकूर" on December 17, 2013 at 10:00am

आदरणीया महेश्वरी जी आपका आभार

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