For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

मौन के शव  ?

बोलते चुपचाप

बात करते आप

रौंदते है मूक अन्तस को

बधिर होता है हाहाकार

दग्ध पर नहीं होते वो

ध्वंस लेता है फिर आकार

यही होता है प्रकृति में 

भावनाओ की विकृति में

सतत क्रम सा बार बार

सभी है सहते उसे

और हाँ कहते उसे

निष्ठुर प्रेम ! 

 

 

(मौलिक व् अप्रकाशित)

Views: 655

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 1, 2013 at 1:47pm

आदरणीय निकोर जी

 आपको अग्रज कहना मुझे अच्छा लगेगा

आपका हिंदी व् इंग्लिश दोनों पर समान अधिकार है

ऐसा सौभाग्य विरलों को मिलता है i

आपका आशिर्वाद पाकर मै भावुक हो गया i

आपका शत शत आभार i

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 1, 2013 at 1:42pm

पटेल जी

आपके प्रोत्साहन के लिए बहुत बहुत आभार i

Comment by vijay nikore on December 1, 2013 at 12:31pm

हृदय के हाहाकार को सुन्दर अभिव्यक्ति मिली है।

इस भावपूर्ण रचना हेतु हार्दिक बधाई।

सादर,

विजय निकोर

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on December 1, 2013 at 12:03pm

बहुत ही गहरी अभिव्यक्ति ...............जय हो

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 1, 2013 at 11:37am

मित्र  गिरिराज जी

आपके प्रोत्साहन का आभारी हूँ  i आप कुशल तैराक है i मोती चुन ही लेंगे i

सादर i


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 30, 2013 at 3:15pm

आदरणीय बड़े भाई गोपाल जी , बड़ा गंभीर विषय चुना है आपने इस बार , बाहर ही बाहर तैर रहा हूँ , अंदर जाने के प्रयास मे हूँ !!!! 

गूढ़ार्थ लिये आपकी रचना के लिये आपको हार्दिक बधाई !!!!!

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 30, 2013 at 2:35pm

म्रदु जी

अंतस को बधिर से मत जोडिये  i

बधिर होता हाहाकार  पृथक भाव्  है

आपने कभी ह्रदय का हाहाकार सुना है

हमारी बुद्धि हमें एक बार सचेत तो करती है

पर चंचल  मन उसे नहीं सुनता  i

शायद इतना संकेत काफी  होगा i

आपका शुष्क रचना में रूचि लेना का आभार i

Comment by राजेश 'मृदु' on November 30, 2013 at 2:09pm

रौंदते है मूक अन्तस को

बधिर होता है हाहाकार

पूरी रचना अत्‍यंत सुंदर लगी पर यहां अटक गया, अन्‍तस-बधिर  का समायोजन बड़ा छल कर रहा है, मार्गदर्शन की अपेक्षा है, सादर

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 30, 2013 at 2:05pm

मीना पाठक जी

आपका हार्दिक आभार  i

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 30, 2013 at 2:05pm

आदरणीय सरना  जी

आपके  प्रोत्साहन का हार्दिक आभार  i

सादर i

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२ ****** घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये उघड़े  शरीर  आप  ही  सम्मान  हो गये।१। *…See More
yesterday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
yesterday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"क्षमा कीजियेगा 'मुसाफ़िर' जी "
Thursday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसफ़िर' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला आपकी…"
Thursday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। भाई रवि जी की सलाह से यह और निखर गयी है । हार्दिक…"
Thursday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Wednesday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212  22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत में क्या से क्या हो गए महब्बत में मैं…"
Wednesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ
"  आपका हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’ जी   "
Wednesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा एकादश. . . . . पतंग
"आदरणीय सुशील सरनाजी, पतंग को लगायत दोहावलि के लिए हार्दिक बधाई  सुघड़ हाथ में डोर तो,…"
Wednesday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय रवि भसीन 'शहीद' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला ग़ज़ल तक आए और हौसला…"
Wednesday
Sushil Sarna posted blog posts
Tuesday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय Jaihind Raipuri जी,  अच्छी ग़ज़ल हुई। बधाई स्वीकार करें। /आयी तन्हाई शब ए…"
Tuesday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service