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सैलाब ..... विजय निकोर

सैलाब

 

अश्कों के बहते सैलाब से जूझते

जब-जब उस आख़री खत को पढ़ा

बेचैन दुखती आँख से मेरी , हर बार

काँपता आँसू वह तुम्हारा था टपका ...

 

कहती थी, खुदा से बात की है तुमने

सुख-दुख हमेशा साझा रहेगा हमारा

अच्छा था फ़ैसला यह तुम्हारे खुदा का

खुश हूँ, तुम्हारा दुख तो अब मेरा रहेगा।

 

कितनी बातें थीं बाकी अभी तो करने को

सिर्फ़ मौसम पर बातें करने के अलावा

दुहरा दिया क्यूँ यादों ने वह किस्सा पुराना

झोंकों में और भी तो नगमे थे इसके सिवा।

 

आखरी उदास शाम उदास न होती तो क्या होती

क्या हुआ आज जो तुम्हारी हर याद से रोना आया

तुम थी तो आते थे मौसम पर मौसम कितने, अब

बस सिसकता सावन, कोई मौसम नया नहीं आया।

 

भीग गए हैं इस सैलाब में उस खत के सारे पन्ने

पर दिल पर लिखे खत का लफ़ज़ एक नहीं बिखरा

अच्छा है टपकते रहे हैं मेरी आँखों से आँसू तुम्हारे

बिना आँचल तुम्हारे, इन आँखों से सैलाब निखरा।

-------

-- विजय निकोर

 (मौलिक व अप्रकाशित)

 

 

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 19, 2013 at 10:30pm

वियोग को बहुत गहन अभिव्यक्ति मिली है, आदरणीय विजय जी

सादर बधाइयाँ


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on November 19, 2013 at 7:45pm

आदरणीय विजय निकोर जी, 

कितनी बातें थीं बाकी अभी तो करने को

सिर्फ़ मौसम पर बातें करने के अलावा

दुहरा दिया क्यूँ यादों ने वह किस्सा पुराना

झोंकों में और भी तो नगमे थे इसके सिवा।

वाह !!!!! क्या बात है.................आनंदित कर दिया आपने, बधाईयाँ................

Comment by annapurna bajpai on November 19, 2013 at 7:18pm

आ० विजय निकोर जी बेहद भावनात्मक प्रस्तुति । बधाई आपको । 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 19, 2013 at 6:09pm

भाव से लेखनी से शब्द से
देते  सदा झकझोर i

दर्द की प्रतिमूर्ति मेरे

परम पूज्य निकोरे  i         अजगुत-अजगुत--अजगुत----i

Comment by वेदिका on November 19, 2013 at 2:08pm

भावना से भरी अभिव्यक्ति पर हार्दिक बधाई स्वीकारिए आदरणीय!!

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on November 19, 2013 at 12:36pm

वाह वाह सर जी

इस भावुक अभिव्यक्ति के लिए ह्रदय से बधाई स्वीकारिये

जय हो

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