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मंदिरों में है बसेरा मस्जिदों में घर तेरा

मंदिरों में है बसेरा मस्जिदों में घर तेरा 
ऐ परिन्दा बोल आख़िर कौन है रहबर तेरा ?

तेरे ज़ख्मों को भरेगा कौन ऐ हिन्दोस्तां ?
मुददतों से है पड़ा बीमार चारागर तेरा 

अम्न के दुश्मन ने फिर ओढ़ा है चाँदी का नक़ाब 
हो न जाये बेअसर इस बार भी पत्थर तेरा 

इस तरफ मोहताज टूटी खाट को आम आदमी 
उस तरफ मख़मल पे सोता है हर इक नौकर तेरा

सोच दिल पे हाथ रखकर ऐ वतन के नौजवां 
हादसों के बाद क्यों आता है नाम अक्सर तेरा

.

"मौलिक व अप्रकाशित" 

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on November 18, 2013 at 7:54pm

बहुत सुन्दर ग़ज़ल कही है आ० सुशील जी 

हर एक शेर लाजवाब है...हार्दिक बधाई इस ग़ज़ल पर 

Comment by अरुन 'अनन्त' on November 17, 2013 at 12:56pm

आदरणीय सुशील जी बहुत ही उम्दा गजल पेश की है आपने बहुत बहुत बधाई स्वीकारें.

Comment by वीनस केसरी on November 17, 2013 at 3:30am

वाह वा कमाल की ग़ज़ल है एक एक शेर पर ढेरो दाद

"परिंदे" सौरभ जी इंगित कर चुके हैं ,, मैं भी यही कहने वाला था


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 16, 2013 at 9:35pm

हर शेर पर दिल से दाद दे रहा हूँ, आदरणीय सुशीलजी. कई शेर अलबत्ता सामान्य बातें साझा करते दीख रहे हैं, लेकिन क्या क़ायदे से कहते दीख रहे हैं ! ग़ज़ल से गुजरना भला लगा है.

यह अवश्य है कि आप अपनी ग़ज़ल के मिसरों का  वज़्न प्रारम्भ में ही उद्धृत कर दें. 

जैसे इस ग़ज़ल के मिसरों का वज़्न  २१२२ २१२२ २१२२ २१२  है.

और,

ऐ परिन्दा बोल आख़िर कौन है रहबर तेरा  .. ऐ परिन्दे, बोल आख़िर कौन है रहबर तेरा

शुभ-शुभ

Comment by Dr Ashutosh Mishra on November 16, 2013 at 3:08pm

उम्दा ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई ...सादर 

Comment by Saarthi Baidyanath on November 15, 2013 at 10:22pm

बहुत बढ़िया कटाक्ष 

उस तरफ मख़मल पे सोता है हर इक नौकर तेरा....वाह 

Comment by डॉ. अनुराग सैनी on November 15, 2013 at 10:10pm

अंजामे मौत से डरता कौन है ?

मेरी बाजु से मुझे ये डसता  कौन है ?

बहुत  फ़रमाया है आपने अंजाम तो सोचना ही पड़ेगा 

सार्थक रचना 

बहुत बहुत बधाई 

Comment by CHANDRA SHEKHAR PANDEY on November 15, 2013 at 8:35pm
बहुत उम्दाभावों ने प्रभावित किया
Comment by Meena Pathak on November 15, 2013 at 5:36pm


सोच दिल पे हाथ रखकर ऐ वतन के नौजवां 
हादसों के बाद क्यों आता है नाम अक्सर तेरा................. बहुत खूब | बधाई आप को 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on November 15, 2013 at 9:10am

बेहतरीन ग़ज़ल बधाई

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