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Sushil Thakur's Blog (20)

ग़ज़ल

मफऊल फ़ायलात मुफ़ाईल फायलुन

आया था लुत्फ़ लेने नवाबों के शह्र में 

हैरतज़दा खड़ा हूँ नक़ाबों के शह्र में 

 

आलूदा है फज़ाए बहाराँ भी इस क़दर 

खुशबू नहीं नसीब गुलाबों के शह्र में 

 

तहज़ीबे कोहना और तमद्दुन नफासतें 

आया हूँ सीखने में नवाबों के शह्र में 

 

ऐसी हसीं वरक़ को यहाँ देखता है कौन 

हर सम्त जाहेलां है किताबों के शह्र में 

 

बेहोश होने का न गुमां हमको हो सका 

हर शख्स होश में है शराबों के…

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Added by Sushil Thakur on June 13, 2014 at 4:00pm — 4 Comments

ग़ज़ल

2122   1122   1122   22

दिल में उम्मीद तो होटों पे दुआ रखता हूँ

तुम चले आना मैं दरवाज़ा खुला रखता हूँ

 

ये तेरा हुस्न अगर जलता शरारा है तो क्या  

मैं भी जज़्बात की जोशीली हवा रखता हूँ

 

राहे-उल्फ़त में तू अपने को अकेला न समझ

दिल में चाहत का दिया मैं भी सदा रखता हूँ

 

ख़ुशनुमा मंज़रो - तस्वीर न गुल बूटे से 

अपने कमरे को दुआओं से सजा रखता हूँ

 

अपनी औक़ात कहीं भूल न जाऊँ ‘साहिल’

इसलिए महल में…

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Added by Sushil Thakur on June 11, 2014 at 10:13pm — 8 Comments

ग़ज़ल

 2122   2122   2122   2122

ज़ुल्फ़ जब उसने बिखेरी बज़्मे-ख़ासो-आम में  

फ़र्क़ बेहद कम रहा उस वक़्त सुब्हो-शाम में

 

झाँककर परदे से उसने इक नज़र क्या देख ली 

जी नहीं लगता हमारा अब किसी भी काम में

 

सिर्फ़ ख़ाकी, खादी पर उठती रही हैं उंगलियाँ

मुझको तो नंगे नज़र आये हैं सब हम्माम में   

 

मान-मर्यादा, ज़रो-ज़न, इज्ज़तो, ग़ैरत तमाम

क्या नहीं गिरवी पड़ी है ख्व़ाहिशे-ईनाम में

 

एक दिन में मुफलिसों का दर्द क्या…

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Added by Sushil Thakur on June 11, 2014 at 10:07pm — 9 Comments

फ़रिश्ता हूँ न कोई देवता हूँ

फ़रिश्ता हूँ न कोई देवता हूँ
खिलौना हूँ मैं मिट्टी से बना हूँ

दग़ा खाने में तू रहता है आगे
दिले-नादान मैं तुझसे ख़फ़ा हूँ

सिला मुझको भलाई का भला दे
ज़ियादा कुछ नहीं मैं माँगता हूँ

मैं जबसे लौटा हूँ दैरो-हरम से
पता सबसे ख़ुदा का पूछता हूँ

मेरा चेहरा किताबे-ज़िन्दगी है
ज़ुबां से मैं कहाँ कुछ बोलता हूँ

"मौलिक व अप्रकाशित"

Added by Sushil Thakur on May 28, 2014 at 8:00pm — 8 Comments

ज़हनो-दिल ख़ामोश है औ’ हर नज़र दीवार पर

दोस्तों चुनाव के दौरान की ग़ज़ल है, विलम्ब से पोस्ट कर रहा हूँ

ज़हनो-दिल ख़ामोश है  औ’ हर नज़र दीवार पर 

क्या इलेक्शन चीज़ है उतरा नगर दीवार पर

या कोई हो आला लीडर या गली का शेर खां 

हर किसी  दिख रही अपनी लहर दीवार पर

इस  इलेक्शन में खड़ा है ऐसा भी उम्मीदवार

जिसने लटकाया कई सर काटकर दीवार पर

भोंकने लगता है 'शेरू' क्या पता किस बात पर

देखते ही मोहतरम का पोस्टर दीवार पर

बस चुनावी रंग में रंगे हैं ये…

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Added by Sushil Thakur on May 24, 2014 at 10:00pm — 6 Comments

गालों पर बोसा दे देकर मुझको रोज़ जगाती है

गालों पर बोसा दे देकर मुझको रोज़ जगाती है

छप्पर के टूटे कोने से याद की रौशनी आती है

दालानों पर आकर, मेरे दिन निकले तक सोने पर

कोयल, मैना,  मुर्ग़ी, बिल्ली मिलकर शोर मचाती है

सबका अपना काम बंटा है आँगन से दालानों तक

गेंहूँ पर बैठी चिड़ियों को दादी मार बगाती है

यूं तो है नादान अभी, पर है पहचान महब्बत की

जितना प्यार करो बछिया को उतनी पूँछ उठती है

लाख छिड़कता हूँ दाने और उनपर जाल बिछाता हूँ

लेकिन घर कोई…

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Added by Sushil Thakur on May 21, 2014 at 6:00pm — 9 Comments

ज़रूरी क्या कि ये राहे-सफ़र हमवार हो जाये

ज़रूरी क्या कि ये राहे-सफ़र हमवार हो जाये

न हों दुश्वारियाँ तो ज़िन्दगी बेकार हो जाये

 

आना का सर कुचलने में कभी तू देर मत करना

कहीं ऐसा न हो, दुश्मन ये भी होशियार हो जाये

 

फरेबो-मक्र, ख़ुदग़रज़ी न ज़ाहिर हो किसी रुख़ से

वगरना आदमी भी शहर का अख़बार हो जाये

 

कभी भी एक पल मैं ख़्वाब को सोने नहीं देता

न जाने किस घड़ी महबूब का दीदार हो जाये

 

मैं दावा-ए-महब्बत को भी अपने तर्क कर दूँगा

जो ख़्वाबों में नहीं आने को वो…

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Added by Sushil Thakur on May 19, 2014 at 7:00pm — 9 Comments

किसी की अधखिली अल्हड़ जवानी याद आती है

किसी की अधखिली अल्हड़ जवानी याद आती है

मुझे उस दौर की इक-इक कहानी याद आती है

 

जिसे मैं टुकड़ा-टुकड़ा करके दरिया में बहा आया   

लहू से लिक्खी वो चिठ्ठी पुरानी याद आती है

 

मैं जिससे हार जाता था लगाकर रोज़ ही बाज़ी

वही कमअक्ल, पगली, इक दीवानी याद आती है

 

जो गुल बूटे बने रूमाल पे उस दस्ते नाज़ुक से

कशीदाकारी की वो इक निशानी याद आती है

 

जो गेसू से फ़िसलकर मेरे पहलू में चली आई 

वो ख़ुशबू से मोअत्तर रातरानी याद…

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Added by Sushil Thakur on May 19, 2014 at 7:00pm — 10 Comments

किसी मासूम की बेचारगी आवाज़ देती है

किसी मासूम की बेचारगी आवाज़ देती है

मुझे मजबूर होटों की हँसी आवाज़ देती है

 

कोई हंगामा कर डाले न मेरी लफ्ज़े-ख़ामोशी

मेरी बहनों की मुझको बेबसी आवाज़ देती है

 

तुम्हारे वास्ते वो रेत का ज़रिया सही, लेकिन

कभी जाकर सुनो, कैसी नदी आवाज़ देती है

 

मेरे हमराह चलकर ग़म के सहरा में तू क्यों तड़पे

तुझे ऐ ज़िन्दगी, तेरी ख़ुशी आवाज़ देती है

 

मैंने क़िस्मत बना डाली है अपनी बदनसीबी को

मगर, तुमको तुम्हारी ज़िन्दगी आवाज़ देती…

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Added by Sushil Thakur on May 18, 2014 at 11:00am — 16 Comments

मंदिरों में है बसेरा मस्जिदों में घर तेरा

मंदिरों में है बसेरा मस्जिदों में घर तेरा 

ऐ परिन्दा बोल आख़िर कौन है रहबर तेरा ?



तेरे ज़ख्मों को भरेगा कौन ऐ हिन्दोस्तां ?

मुददतों से है पड़ा बीमार चारागर तेरा 



अम्न के दुश्मन ने फिर ओढ़ा है चाँदी का नक़ाब 

हो न जाये बेअसर इस बार भी पत्थर तेरा 



इस तरफ मोहताज टूटी खाट को आम आदमी 

उस तरफ मख़मल पे सोता है हर इक नौकर तेरा



सोच दिल पे हाथ रखकर ऐ वतन के नौजवां 

हादसों के बाद क्यों आता है नाम अक्सर तेरा

.

"मौलिक व…

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Added by Sushil Thakur on November 14, 2013 at 4:30pm — 16 Comments

चाहे छोटी हो या बड़ी बेटी

चाहे छोटी हो या बड़ी बेटी
दिल में रहती है हर घड़ी बेटी
उसके दम से है रौशनी घर में
जैसे दीपों की हो लड़ी बेटी
उससे होली भी है दीवाली भी
वो है प्यारी सी फुलझड़ी बेटी
जब कभी घर में हो गई अनबन
तो बनी प्यार की कड़ी बेटी
इस तरह से संभालती है मुझे
जैसे हो मुझसे भी बड़ी बेटी
कैसे दुनियां को जान पायेगी

घर में शामो सहर पड़ी बेटी

मौलिक व अप्रकाशित

Added by Sushil Thakur on September 9, 2013 at 12:00am — 11 Comments

मेरी नज़रों में तो वो खरगोश ही था मोतवर

मेरी नज़रों में तो वो खरगोश ही था मोतवर

जिसने बाज़ी हारकर कछुए को कर डाला अमर

यूं हुई पलकों से रुखसत नींद कि लौटी नहीं

लाख ही उसको बुलाते रह गए हम रातभर

इश्क़ का जब-जब हुआ दिल हद से ज़्यादा बेक़रार

हुस्न ने तब- तब कहा कि और थोड़ा सब्र कर

ऐ क़लमकारो वो अह्सासे मुहब्बत भी लिखो

माँ की छाती मुंह में जब लेता है बच्चा दौड़कर

क़ायदे क़ानून के फंदे हैं बस मेरे लिए

उसने तो गठरी बनाकर रख दिया है ताक…

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Added by Sushil Thakur on September 7, 2013 at 2:30pm — 16 Comments

रोज़ा, नमाज़, हज औ तिलावत न कर सका

रोज़ा, नमाज़, हज औ तिलावत न कर सका

अपने वजूद की मैं हिफाज़त न कर सका

दैरो हरम में आ के तो सजदा किया ज़रूर

लेकिन कभी मैं दिल से इबादत न कर सका

बिकता रहा ज़मीर भी कौड़ी के भाव में

मैं चाहकर भी इसकी हिफ़ाज़त न कर सका

तेरे क़दम भी रुक गए उल्फत की राह में 

मै भी अकेला घर से बग़ावत न कर सका

तेरे बदन में देखकर पाकीज़गी की आग 

कोई भी शख्स छूने की ज़ुर्रत न कर सका

मैख़ाने में गुज़ार दी 'साहिल' ने…

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Added by Sushil Thakur on September 2, 2013 at 6:30pm — 18 Comments

ग़ज़ल : रखना ख्याल

रखना ख़याल शह्र का मौसम बदल न जाय

जुल्मत कहीं चराग़ की लौ को निगल न जाय

आमादा तो है नस्लकुशी पर अमीरे शह्र

डरता भी है कि उसका पसीना उबल न जाय

अजदाद से मिला जो…

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Added by Sushil Thakur on August 31, 2013 at 9:39am — 16 Comments

वो जिसको मालोज़र पैसा बहुत है

वो जिसको मालोज़र पैसा बहुत है

हक़ीक़त में वही रोता बहुत है

यक़ी करना ज़रा मुश्किल है तुझपे

तेरा तर्ज़े अदा मीठा बहुत है

वो पहली आरी की ज़द में रहेगा

शजर जो बाग़ में सीधा बहुत है

उसे तो साफगोई की है आदत

बगरना आदमी अच्छा बहुत है

वो कहता है "तुम्हें हम देख लेंगे"

हमारे पास भी रस्ता बहुत है

कभी तू ने हमें अपना कहा था

हमारे वास्ते इतना बहुत है

"मौलिक व…

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Added by Sushil Thakur on August 29, 2013 at 7:30pm — 12 Comments

राह के वो हाशिये थे.....

राह के वो हाशिये थे एक पल में हट गये 

रास्ते चौड़े हुए तो पेड़ सारे कट गये 



एक है चेहरा हमारा और खूं का रंग भी 

क्या रही मज़बूरी जो हम मज़हबों में बंट गये 



ग़मज़दा हूँ मैं कि मेरे पैर में जूते नहीं 

क्या गुज़रती होगी उसपे पांव जिसके कट गये 



न रहे दादा न दादी जो रटाये राम- राम 

देखकर माहौल घर का, तोते गाली रट गये 



रिज्क़ की तंगी कुछ ऐसी हो गई अब गाँव में 

औरतें तो रह गईं पर मर्द काफी घट गये 



ज़िन्दगी के…

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Added by Sushil Thakur on July 11, 2013 at 4:00pm — 6 Comments

यूं ही बचपन गया शरारत में

यूं  ही बचपन गया शरारत  में

औ' जवानी गयी  मुहब्बत  में

और जो वक़्त जिंदगी के बचे

वो भी गुज़रे फ़क़त तिजारत में  



बादे मुश्किल मिले जो पल वो भी

हो गए रायगाँ शिकायत में

मुफ्लिसों को भला  बुरा  कहना

है शुमार आज सबकी आदत में



फूल बेलपत्र के अलावा शिव

जान  मांगे है अब ज़ियारत में



फ़ासला तू औ' मैं का जब न मिटे

तो मज़ा ख़ाक है मुहब्बत में



गाँव से वो कपास की कतरन

जाके चुनता है शह्रे सूरत…

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Added by Sushil Thakur on July 6, 2013 at 5:00pm — 5 Comments

ग़ज़ल - आया था लुत्फ़ लेने नवाबों के शह्र में

आया था लुत्फ़ लेने नवाबों के शह्र में

हैरतज़दा खड़ा हूँ नक़ाबों के शह्र में

आलूदा है फज़ाए बहाराँ भी इस क़दर

खुशबू नहीं नसीब गुलाबों के शह्र में

तहज़ीबे कोहना और तमद्दुन नफासतें

आया हूँ सीखने में नवाबों के शह्र में

ऐसी हसीं वरक़ को यहाँ देखता है कौन

हर सम्त जाहेलां है किताबों के शह्र में

बेहोश होने का न गुमां हमको हो सका

हर शख्स होश में है शराबों के शह्र में

चेहरे पे सादगी है तो जुल्फें…

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Added by Sushil Thakur on July 4, 2013 at 10:30pm — 13 Comments

तरही ग़ज़ल (अभी कुछ और करिश्में ग़ज़ल के देखते हैं)

हम अपने प्यार का लहजा बदल के देखते हैं 
तुम्हारी तर्ज़े अदा में भी ढल के देखते हैं 
.
तुम अपनी तल्ख़ ज़ुबां में जो शीरिनी लाओ 
तो हम भी क़ैदे अना से निकल के देखते हैं 
.
वो  दौर और था जब रूह की गिज़ा थी ग़ज़ल 
अभी कुछ और करिश्में ग़ज़ल के देखते हैं  
.
दिखाई देता था छप्पर ही ख़्वाब में हमको 
तुम आ गये हो तो सपने महल के देखते हैं 
.
हवा के दोस पे नामा ये कैसा है…
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Added by Sushil Thakur on July 4, 2013 at 12:30am — 8 Comments

बदी की राह से अब तो निकाल दे मुझको

बदी की राह से अब तो निकाल दे मुझको

खुदाया जब भी दे रिज्के हलाल दे मुझको

नहीं मैं राई को पर्वत, न तिल को ताड़ कहूं

ज़ुबान  साफ़ औ' सादा  ख़याल दे  मुझको .

तेरे लिए भी ये आसां नहीं है फिर भी कभी

तू आके चुपके से हैरत में डाल दे मुझको

जुनूने इश्क़ कहीं कुफ्र तक न पहुँचा दे

तू अपने गोशाये दिल से निकाल दे मुझको

मुझे भी पी के बहकना कभी गंवारा नहीं

मगर जो गिरने पे आऊँ, संभाल दे…

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Added by Sushil Thakur on July 3, 2013 at 3:00pm — 12 Comments

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